21 जनवरी 2026,

बुधवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

बुंदेलखंड के पानी से धरती का पेट भरने की जवाबदारी महिलाओं पर

जल-जन जोड़ो अभियान ने गांव-गांव में बनाईं जल सखी, जल दूत, जल मित्र और पानी पंचायत

4 min read
Google source verification
Chhatarpur

Chhatarpur

छतरपुर। जिले सहित पूरे बुंदेलखंड में मानसून दस्तक देने की तैयारी में है, मगर बुंदेलखंड का इलाका बूंद-बूंद पानी के संकट के दौर से गुजर रहा है। कई-कई किलोमीटर का रास्ता तय करने के बाद पीने का पानी नसीब हो पा रहा है। पानी का इंतजाम करने के लिए सबसे ज्यादा संघर्ष करने वाली महिलाओं को ही अब पानी बचाने की जिम्मेदारी दी जा रही है। पानी के महत्व को समझ चुकी बुंदेलखंड की अनपढ़ और ठेठ देहाती लेकिन जागरुक महिलाओं ने संकल्प लिया है कि वे पानी से धरती का पेट भरने में पीछे नहीं रहेंगी, ताकि आने वाले सालों में उन्हें इस तरह की समस्या से न जूझना पड़े। महिलाओं को पानी का महत्व समझाकर जल सकी, जलदूत और जल मित्र जैसे रिश्ते कायम करके बारिश का पानी सहेजने के लिए बुंदेलखंड के गांवों में बड़ी योजना बनाई जा रही है। यह काम जल पुरुष राजेंद्र सिंह राणा के निर्देशन में जल-जन जोड़ो अभियान द्वारा किया जा रहा है। अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो आने वाले समय में कई गांवों का जल संकट खत्म होने की स्थिति बन जाएगी।
बुंदेलखंड वह इलाका है, जहां कभी 9000 से ज्यादा तालाब और इससे कहीं ज्यादा कुएं हुआ करते थे। लगभग हर घर में एक कुआं होता था। आज ऐसा नहीं है। दूसरी तरफ , पानी संग्रहण और संचय की प्रवृत्ति भी कम हो गई है। इसके साथ ही पानी का दोहन बढ़ गया है। छतरपुर जिले के बड़ामलहरा के झिरिया झोर की पानी पंचायत की सचिव सीमा विश्वकर्मा बताती हैं कि इस इलाके में पानी का संकट बना हुआ है। झिरिया झोर की महिलाओं ने बीते सालों में कई स्थानों पर पानी रोकने का काम किया था, उसी का नतीजा है कि एक तालाब में अब भी पानी बचा हुआ है। गांव के हैंडपंप ने पानी देना बंद कर दिया है, यहां की कई महिलाएं हैंडपंप भी सुधार लेती हैं, अगर पाइप मिल जाएं तो हैंडपंप को और गहरा करके पानी हासिल करने का प्रयास कर सकती हैं। घुवारा क्षेत्र के बुजुर्ग रामसेवक पटेल (70) बताते हैं कि पहले बुंदेलखंड के लगभग हर घर में कुआं हुआ करता था, आज लोगों ने कुएं खत्म कर दिए हैं, बोरिंग पर जोर है, लिहाजा पानी का स्तर नीचे चला गया है। इतना ही नहीं, तालाबों व अन्य जलितों तक बारिश का पानी पहुंचने के रास्ते भी बंद हो गए हैं, अगर अब भी नहीं जागे तो आने वाले वर्षों में हालात और भी बिगड़ेंगे।
गांव-गांव में जल सहेली बनाकर पानी रोकने का प्रयास :
बुंदेलखंड में महिलाओं में जल संरक्षण के प्रति जागृति लाने के लिए ग्रामीण स्तर पर काम करने वाली जल सहेली गनेशी बाई बताती हैं कि क्षेत्र की महिलाओं ने संकल्प लिया है कि इस बार बारिश के पानी को बहकर नहीं जाने देंगी। उसे धरती के पेट तक पहुंचाने के लिए जगह-जगह पानी को रोकेंगी। ऐसा करने से भूजल स्तर बढ़ेगा और पानी के संकट से काफी हद तक मुक्ति मिलेगी। बुंदेलखंड के कई गांव में सामाजिक संगठनों ने पानी पंचायतें बनाई हैं, इन पानी पंचायतों में से दो को 'जल सहेलीÓ चुना जाता है। यह पानी पंचायत और जल सहेलियां मिलकर पानी संरक्षण के प्रति जनजागृति लाने का प्रयास करती हैं। जल सेहली रानी उपाध्याय कहती हैं कि 'जल है तो जीवन हैÓ- यही संदेश वे महिलाओं को दे रही हैं। उन्होंने कहा कि हम सबने ठाना है कि इस बार मानसून की बारिश के पानी को जगह-जगह रोकेंगे और बेकार बह जाने वाले पानी को तालाबों तक पहुंचाएंगे, ताकि जलस्तर नीचे न जाए और गर्मियों में पानी का संकट न गहराए।
वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने पर टैक्स में देंगे छूट :
राजनगर नगर पंचायत अध्यक्ष रचना विपिन पटैरिया का कहना है कि महिलाओं को ही सबसे ज्यादा पानी की जरूरत पड़ती है और उसका इंतजाम करने में उन्हें ही संघर्ष करना पड़ता है। ऐसे में वे महिलाओं को ही अब पानी बचाने के काम में लगाएंगी। साथ ही वे एक महिला जनप्रतिनिधि हैं, इसलिए उन्होंने निर्णय लिया है कि जो नए मकान नगर में बनेंगे और रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम की व्यवस्था करेगा, उसे हाउस टेक्स में छूट दी जाएगी।
मध्य प्रदेश के छह जिले- छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना, दमोह, सागर, दतिया और उत्तर प्रदेश के सात जिलों- झांसी, ललितपुर, जालौन, हमीरपुर, बांदा, महोबा, कर्वी (चित्रकूट) को मिलाकर बुंदेलखंड बनता है। सूखे के कारण इस क्षेत्र में खेती हो नहीं पा रही है और गांव में काम नहीं है, लिहाजा यहां से बड़ी संख्या में लोग काम की तलाश में दिल्ली, गुरुग्राम, गाजियाबाद, पंजाब, हरियाणा और जम्मू कश्मीर के लिए पलायन कर रहा है। तालाब मैदान में बदल गए हैं। कुओं की तलहटी सूखी नजर आने लगी है। कई हिस्सों में तो लोग पानी के लिए पूरा-पूरा दिन लगा देते हैं। ऐसे में सूखे बुंदेलखंड की धरती पर एक ऐसी बुनियाद रखी जा रही है, जो अगर कारगर हुई तो प्यासी बुंदेली धरती का पेट बारिश के जल की संचित बूंदों से भर जाएगा।
- राजेंद्र सिंह राणा, जल पुरुष
उम्मीद की जा सकती है कि तस्वीर बदलेगी :
पानी से सीधा जुड़ाव महिलाओं का होता है, यह वह इलाका है, जहां पानी की व्यवस्था भी महिलाओं के जिम्मे होती है। पानी संरक्षण के लिए तो महिलाएं काम करेंगी ही। इसलिए उन्होंने अपने संगठन के माध्यम से गांव-गांव में महिलाओं के समूह पानी बचाने के अभियान में लगाए हैं। इसके परिणाम भी सामने आने लगे हैं। बुंदेलखंड की महिलाओं ने पानी बचाने, संग्रहीत करने और धरती का पेट भरने का संकल्प लिया है और अगर इसमें वे सफल होती हैं तो आने वाले दिनों में इस इलाके की सूरत बदलेगी जरूर, ऐसी उम्मीद तो की ही जा सकती है।
- डॉ. संजय सिंह, राष्ट्रीय संयोजक जल-जन जोड़ो अभियान