
बर्तन कारखाना
बुंदेलखंड की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा रही तांबा-पीतल शिल्पकला आज दम तोडऩे की कगार पर है। तमराई मोहल्ले की गलियां, जहां कभी बर्तनों की हथौड़ी की खनक गूंजती थी, अब वीरान पड़ी हैं। डेढ़ सैकड़ा कारीगरों की बस्ती सिमटकर अब महज डेढ़ दर्जन परिवारों तक रह गई है। इनमें से भी कई धीरे-धीरे इस पेशे से दूरी बना रहे हैं।
प्लास्टिक और स्टील के आकर्षक और सस्ते बर्तनों ने परंपरागत ताम्र शिल्प को हाशिये पर धकेल दिया है। स्वास्थ्य के लिहाज से लाभकारी माने जाने वाले तांबा-पीतल के पात्र अब घरों से लगभग गायब हो चुके हैं। नतीजा यह हुआ कि कारीगरों की मेहनत को बाजार नहीं मिल रहा और वे रोजगार छोडऩे को मजबूर हो गए हैं।
करीब दो दशक पहले छतरपुर में बने बर्तन केवल बुंदेलखंड ही नहीं, बल्कि ग्वालियर, झांसी, मऊरानीपुर और देश के अन्य हिस्सों तक जाते थे। कारीगरों की प्रतिष्ठा इतनी थी कि दूसरे राज्यों के शिल्पी भी छतरपुर आकर काम किया करते थे। परंतु धातुओं के दामों में उछाल, टैक्स का बढ़ता बोझ और आधुनिकता की चकाचौंध ने इस कला को बाजार से बाहर कर दिया।
कारीगर ऊदल ताम्रकार बताते हैं कि पीतल जो पहले 280 रुपए प्रति किलोग्राम मिलता था, आज 550 रुपए तक पहुंच चुका है। वहीं तांबे की कीमतें भी आसमान छू रही हैं। ऊपर से सरकार ने टैक्स 5त्न से बढ़ाकर 12.5त्न कर दिया है। ऐसे में ग्राहक दूर हो गए और कारीगर बेरोजगारी की तरफ धकेल दिए गए।
कारीगर संजय ताम्रकार का कहना है कि जिस तेजी से यह धंधा घट रहा है, अनुमान है कि दो-तीन सालों में छतरपुर से तांबा-पीतल का कारोबार पूरी तरह खत्म हो जाएगा। नई पीढ़ी भी इस पेशे में रुचि नहीं ले रही।
वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि तांबे में पानी रखने से कई बीमारियों की रोकथाम होती है—डायरिया, पीलिया, गैस, थायरॉयड और यहां तक कि कैंसर से लडऩे की क्षमता भी बढ़ती है। वहीं पीतल का पानी पाचन और शरीर को मजबूत बनाने में सहायक होता है। इसके बावजूद लोग सस्ते और अस्वास्थ्यकर विकल्पों की ओर मुड़ गए हैं।
जिला ताम्रकार समाज उपाध्यक्ष अभिषेक ताम्रकार कहते हैं कि सरकार की बेरुखी सबसे बड़ा कारण है। यदि परंपरागत शिल्प को प्रोत्साहन दिया जाए, टैक्स कम किया जाए और बाजार उपलब्ध कराया जाए तो यह कला फिर से जीवित हो सकती है। अन्यथा यह उद्योग सिर्फ इतिहास की किताबों में रह जाएगा।
Published on:
30 Aug 2025 10:29 am
