24 अक्टूबर 2026,

शनिवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

आदेश के बाद भी राहत नहीं, पहले केस जीतने के लिए किया संघर्ष, अब क्षतिपूर्ति- मुआवजा के लिए कर रहे जद्दोजहद

दुकानदार, बिल्डर, एलआईसी या किसी भी तरह की कंपनी हो, फोरम का आदेश होने के बावजूद लोगों को क्षतिपूर्ति, मुआवजा, सामान या किसी भी तरह की राहत नहीं दे रही है। इस वजह से लोगों को दोबारा उपभोक्ता फोरम जाकर अपील करनी पड़ रही
2 min read
Follow Patrika on Google News
Google source verification

छतरपुर

•

image

Dharmendra Singh

•

Updated: 12 May 2026, 10:50 AM IST

consumer fouram

उपभोक्ता फोरम

लोगों को जिला और राज्य उपभोक्ता फोरम में अपने अधिकारों के लिए वर्षों कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ रही है। मुश्किलें उस समय और बढ़ जाती हैं जब फोरम का आदेश होने के बाद भी लोगों को राहत नहीं मिलती। दुकानदार, बिल्डर, एलआईसी या किसी भी तरह की कंपनी हो, फोरम का आदेश होने के बावजूद लोगों को क्षतिपूर्ति, मुआवजा, सामान या किसी भी तरह की राहत नहीं दे रही है। इस वजह से लोगों को दोबारा उपभोक्ता फोरम जाकर अपील करनी पड़ रही है कि आदेश होने के बावजूद उन्हें कोई राहत नहीं मिली है। शहर और जिले में ऐसे दर्जनों केस हैं जिनमें फोरम का आदेश जारी होने के बाद भी लोगों को राहत नहीं मिली है। चौंकाने वाली बात यह है कि फोरम द्वारा ऐसे लोगों पर सख्ती भी नहीं की जा रही है। केवल मामले की सुनवाई जारी है और तारीख दी जा रही है।

90 दिन में निपटाना होता है

उपभोक्ता फोरम के नियमों के अनुसार जो भी मामले आते हैं, उन्हें 90 दिन में निपटाना होता है। 3 माह में हर हाल में सुनवाई पूरी कर फैसला देना होता है। लेकिन लोगों के मामले 3-3 साल तक लंबित हो रहे हैं। लोग कई साल तक फोरम के चक्कर काटते रहते हैं। जब उनके पक्ष में आदेश आ भी जाता है, तो सामने वाला पक्ष उन्हें समय पर पैसे या राहत नहीं देता है। इस वजह से लोगों को पैसा पाने के लिए फिर से फोरम में आवेदन देना पड़ रहा है और फोरम के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। अभी जिले में हर महीने 10 से ज्यादा मामले केवल पैसे पाने के लिए ही आ रहे हैं। वहीं एक साल में ऐसे करीब 214 केस हैं, जिन पर आदेश होने के बावजूद लोगों को राहत नहीं मिली।

नौगांव और छतरपुर के केस ज्यादा

मिली जानकारी के अनुसार जिला आयोग में नौगांव और छतरपुर के केस सबसे अधिक लंबित हैं। यहां के करीब 85 केस निष्पादन के लिए पेंडिंग हैं। इन प्रकरणों में फोरम पहले ही फैसला दे चुका है, लेकिन उनके आदेश का पालन नहीं किया गया। इसके बाद गौरिहार के 08, बड़ामलहरा के 05, बमीठा 07 और खजुराहो के 13 केस लंबित हैं।

केस-01: रकम नहीं मिली

चौका के एक बुजुर्ग ने अपनी कार के क्लेम के लिए 5 साल केस लड़ा। कोर्ट ने सितंबर 2025 में कंपनी को दो लाख रुपए देने का आदेश दिया। आदेश के 8 महीने बाद भी कंपनी ने भुगतान नहीं किया। अब बुजुर्ग रकम पाने के लिए फोरम के फिर से चक्कर काट रहे हैं।

केस-02: बिल्डर ने नहीं दिए पैसे

बेनीगंज मोहल्ला निवासी रामकुमार कुशवाहा ने 2024 में फ्लैट बुकिंग के लिए राशि दी थी। पजेशन न मिलने पर 2025 में परिवाद दायर किया। सितंबर 2025 में आदेश हुआ कि 12 प्रतिशत ब्याज के साथ राशि लौटाई जाए, लेकिन बिल्डर ने अभी तक उन्हें पैसे नहीं दिए।

एक्सपर्ट व्यू

उपभोक्ता फोरम में आदेश पारित होने के बाद विपक्षी पार्टी को अपील की अवधि में जुर्माना देना होता है। यदि वे नियत समय में जुर्माना नहीं देते, तो परिवादी उनके खिलाफ फोरम में निष्पादन आवेदन लगाता है। इसके बाद जमानती वारंट और उसका जवाब न देने पर गिरफ्तारी वारंट जारी होता है। फोरम के आदेश के बाद भी रकम न देने पर 3 साल की सजा का प्रावधान भी है।

आशीष शुक्ला, फोरम मामलों के सेवानिवृत्त अधिवक्ता