
गौरया के संरक्षण के लिए लगाया गया घोषला
छतरपुर. ओ री चिरैया, नन्ही सी चिडिय़ा, अंगना में फिर आजा रे... यह गीत उन नन्हीं बालिकाओं पर केंद्रीत है, जो हमारे घऱ-आंगन में गौरैया की तरह फुदकती चहचहातीं हैं। लेकिन जिन गौरैया को हम अपनी बच्चों की तरह मानते हैं। आज वही गौरैया पक्षी विलुप्त होने की कगार पर है। प्रतिवर्ष 20 मार्च को खुशियों के प्रतीक गौरैया के संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है। हमारी आधुनिक जीवन शैली के चलते गौरैया भी मॉरीशस के डोडो पक्षी और गिद्ध की तरह पूरी तरह से विलुप्त हो जाएंगी। देश की राजधानी दिल्ली में तो गौरैया इस कदर दुर्लभ हो गई है कि ढूंढने से भी ये पक्षी नहीं मिलता। इसलिए वर्ष 2012 में दिल्ली सरकार ने इसे राज्य-पक्षी घोषित कर दिया।
वर्ष 2017 से बुंदेलखंड में पर्यावऱण संरक्षण के लिए काम कर रहे समाजसेवी संगम सेवालय के संचालक विपिन अवस्थी ने बताया कि सबसे पहले द नेचर फॉरएवर सोसाइटी ऑफ इंडिया एवं फ्रांस के इको-एसआईएस एक्शन फाउंडेशन द्वारा विश्व गौरैया दिवस मनाने का विचार वर्ष 2010 में रखा गया था। गौरैया आज अपने अस्तित्व के लिए मनुष्यों और अपने आसपास के वातावरण से काफ़ी जद्दोजहद कर रही है। पश्चिमी देशों में हुए अध्ययनों के अनुसार गौरैया की आबादी घटकर खतरनाक स्तर तक पहुंच गई है। अब भारत ही नहीं, यूरोप के कई बड़े हिस्सों में भी काफ़ी कम रह गई है। ब्रिटेन, इटली, फ्रांस, जर्मनी और चेक गणराज्य जैसे देशों में इनकी संख्या जहां तेजी से गिर रही है, तो नीदरलैंड में तो इन्हें 'दुर्लभ प्रजाति के वर्ग में रखा गया है।
अभी नहीं जागे तो आगे होगा बहुत नुकसान
महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में जीव विज्ञान के विभाग प्रमुख डॉ. एचएन खरे ने का कहना है कि हमारे आसपास बढ़ते प्रदूषण, शहरीकरण एवं ग्लोबल वार्मिंग के कारण गौरैया सहित कई महत्वपूर्ण प्रजाति के पक्षी आज विलुप्ति की कगार पर हैं। गौरैया को फिर से आंगन में बुलाने के लिए लोगों को अपने घरों में कुछ ऐसे स्थान उपलब्ध कराने चाहिए, जहां वे आसानी से अपने घोंसले बना सकें और उनके अंडे हमलावर पक्षियों से सुरक्षित रह सकें।
मोबाइल रेडिएशन बन रहा अस्तित्व के लिए खतरा
बुंदलेखंड के जाने-माने पक्षीविद्, बर्ड रिसर्चर एवं श्रीकृष्णा विश्वविद्यालय में पर्यावरण विज्ञान के एचओडी डॉ. निकेश मिश्रा का कहना है कि गौरेया पक्षी अपने भोजन और जल की कमी, घोसलों के लिए उचित स्थान न होना, साथ ही तेज़ी से कटते पेड़-पौधे इनकी संख्या में कमी का मुख्य कारण हैं। इनके बच्चों का भोजन शुरूआती दिनों में सिर्फ कीड़े-मकोड़े ही होते है, लेकिन आजकल लोग खेतों से लेकर घरों के पेड़-पौधों में भी रासायनिक पदार्थों का उपयोग करते हैं, जिससे ना तो पौधों को कीड़े लगते हैं और ना ही इस पक्षी का समुचित भोजन पनप पाता है। मोबाइल फोन तथा मोबाइल टॉवरों से निकलने वाली सूक्ष्म तरंगें गौरैया के अस्तित्व के लिए खतरा बन रही हैं। इससे इनकी संख्या में 60 प्रतिशत तक की कमी देखी जा रही है।
Published on:
19 Mar 2023 05:38 pm
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