
सरकारी कार्यालयों में लगे निजी परमिट के वाहन,सरकारी कार्यालयों में लगे निजी परमिट के वाहन
छतरपुर. सरकारी विभागों में टैक्सी पास की जगह पर निजी वाहन अटैच किए जा रहे हैं। जबकि नियम से विभाग में लगने वाले चार पहिया वाहन टैक्सी में पास होना अनिवार्य है। नियम की जानकारी सभी जिला अधिकारियों को है। इसके बावजूद शासन के निर्देशों को ताक पर रखकर अधिकारियों ने निजी वाहन कार्यालय के उपयोग के लिए लगा रखे हैं। जिसकी वजह से परिवहन विभाग को हर साल लाखों रुपए राजस्व की हानि हो रही है। जबकि टैक्सी में पास कराने के लिए लोगों को अधिक टैक्स जमा करना होता है। वहीं रजिस्ट्रेशन व फिटनेस की अलग से फीस जमा करनी होती है। निजी में पास कराने पर कम टैक्स लगता है, और आजीवन के लिए कोई झंझट नहीं रहता है। दूसरी ओर इन गाडिय़ों से कई बार घटनाएं हो चुकी हैं। घटना के बाद अधिकारी व वाहन मालिक ले देकर मामला को खत्म कर देते हैं।
गौरतलब है कि शासन ने 2014 से सभी विभागों में टैक्सी वाहन लगाने के लिए सख्त निर्देश दिए हैं। इसके बावजूद भी जिला अधिकारियों ने जिले में 80 से अधिक निजी वाहन लगा रखे हैं। जबकि निजी वाहन अपने उपयोग में ले सकते हैं। ना कि किसी कार्यालय में लगा सकते हैं। कार्यालय में लगाना है तो उसका टैक्सी में पास होना आवश्यक होता है। अधिकारियों एवं वाहन मालिकों की साठगांठ के चलते निजी वाहनों को विभागों के कार्य के लिए लगाया गया है। निजी वाहन जिला पंचायत, महिला बाल विकास, पीआरओ, पुलिस विभाग, आबकारी, जनपद पंचायत, नगर पालिका, राजस्व विभाग, पीडब्ल्यूडी, कृषि विभाग सहित अन्य विभाग में लगे हुए हैं।
खासबात ये कि कार्यालय में लगे वाहनों से कई बार एक्सीडेंट भी हो चुके हैं। अधिकारियों द्वारा मामला को पैसा देकर रफा दफा कर लिया जाता है। यदि टैक्सी वाहन किसी कार्यालय में लगी है और उसे अन्य प्रदेश में जाना है तो उसे उस प्रदेश का टैक्स वाहन मालिक को कटाना होता है। जिला प्रशासन ने निजी गाडिय़ों लगा रखी हैं। इसलिए उन्हें अन्य प्रदेश में जाने पर टैक्स भी नहीं कटाना पड़ता है।
1 से डेढ़ हजार रुपए तक जमा करना पड़ता है शुल्क
यदि चार पहिया वाहन को टैक्सी में पास कराते हैं तो करीब गाड़ी की कीमत से करीब 8 से 9 प्रतिशत टैक्स जमा करना होता है। साथ ही रजिस्ट्रेशन फीस करीब 3 से 4 हजार रुपए, उसके बाद हर साल गाड़ी की फिटनेस करानी होती है। जिसमें करीब एक से डेढ़ हजार तक व इससे अधिक शुल्क जमा करना होता है।
अधिकारियों व कर्मचारियों ने लगा रखे हैं अपने निजी वाहन
जिला अधिकारियों व कर्मचारियों ने अपने भाई या रिश्तेदार के नाम से गाडिय़ां खरीद ली हैं और अपने कार्यालय में ही गाडिय़ों को लगा रखा हैं। शासन वाहन लगाने पर 25,३० से लेकर 3५ हजार रुपए व इससे अधिक प्रतिमाह भुगतान किया जा रहा है। गाड़ी भी अधिकारी सामने रहती है और देखरेख होती रहती है।
निजी वाहन से शासन को नहीं मिल पाता है राजस्व
शासन ने निजी वाहनों पर टैक्स बहुत कम रखा है। क्योंकि वह निजी उपयोग के लिए होती है। विभाग में लगाने के लिए टैक्सी वाहन होना अनिवार्य है। इसके लिए शासन ने सभी जिला अधिकारियों को निर्देश भी दिए हैं। जिससे राजस्व भी आता है। टैक्सी वाहन पर टैक्सी भी अधिक रहता है, और उसकी हर साल फिटनेस करानी होती है। इसी कारण लोग अपने वाहन को टैक्सी परमिट में पास करवाने से बचते हैं।
कारनामें उजागर होने का भी होता है डर
नियमों को दरकिनार करते हुए बिना टैक्सी परमिट के वाहनों को किराए पर रखने के पीछे कई कारण होते है। कई अधिकारी व विभागों के लिपिक अपने खुद के व रिश्तेदारों के वाहनों को विभाग में किराए पर लगाए हुए हैं। इससे अधिकारियों द्वारा किए जाने वाले कारनामें भी छिपे रहते हैं। बाहरी व्यक्ति के आने से कारनामें उजागर होने का डर बना रहता है। यही कारण है कि खुद को सुरक्षित रखने के लिए नियमों को ताक पर रख दिया जाता है।
इनका कहना है
निजी वाहनों को कहीं पर भी कमर्शियल कार्य में लगाना नियम के विरुद्ध है, वित्त विभाग से ऐये वाहनों को भुगतान पर भी रोक लगाई है। हम जानकारी करते हैं और जिस विभाग में प्राईवेट परमिट के वाहन लगे हैं उन्हें नोटिस भेजे जाएंगे।
विक्रमजीत सिंह कंग, आरटीओ, छतरपुर
Published on:
30 Dec 2023 06:00 pm
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