
प्रोबेशन पीरियड में बनाया गाइड
छतरपुर. महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय प्रशासन ने अध्यादेश व नियमों को ताक पर रखकर अपात्रों को पीएचडी का शोध निदेशक बनाया है। 70 फीसदी अपात्रों को शोध निदेशक बनाने वाला विश्वविद्यालय प्रशासन अब अपनी गलतियों को छिपाने के लिए गुमराह कर रहा है। विश्वविद्यालय के कुलसचिव गलत दलीलें देकर गड़बड़ी को छिपाने में जुट गए हैं।
प्रोबेशन पीरियड में बनाया गाइड
महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलसचिव जेपी मिश्रा ने पत्र के जरिए स्वीकार किया है कि नियमित प्रोफेसर व सहायक प्राध्यापक ही शोध निदेशक बन सकते हैं, लेकिन उनके द्वारा 11, 15 और 24 जून 2022 को जारी की गई शोध निदेशकों की अधिसूचना में ऐसे सहायक प्राध्यापकों को शोध निदेशक बनाया है। जिनकी नियुक्ति वर्ष 2019, 2020 और 2021 में हुई है। शोध निदेशक बनाए गए सहायक प्राध्यापकों में 50 फीसदी ऐसे हैं, जिनकी ई-सर्विस बुक में अभी भी प्रोबेशन पीरियड खत्म होने और नियमितीकरण का आदेश दर्ज नहीं है।
पांच साल के अध्यापन अनुभव का अनिवार्य नियम दरकिनार
विश्वविद्याल प्रशासन ने पीएचडी शोध निदेशक के लिए अध्यापन का पांच साल का अनिवार्य नियम भी दरकिनार कर दिया है। ऐसे सहायक प्राध्यापकों को गाइड बनाया गया है, जिनकी सेवा काल 2 से तीन साल की हुई है। उन्हें पांच साल का अनुभव नहीं है। ऐसे सहायक प्राध्यापकों की खुद की पीएचडी ही 2 से 3 साल पूर्व हुई है, ऐसे में पांच साल का अनुभव कहां से आया। वहीं इंटरनेशनल-नेशनल रेफर्ड जनरल में शोध भी प्रकाशित नहीं हुए हैं। फिर भी कुलसचिव ने शोध निदेशक बनाया है।
सेमिनार के रिसर्च, संविदा अवधि की नौकरी को नहीं बनाया जा सकता आधार
विश्वविद्यालय, कॉलेज में हुए सेमिनार के दौरान प्राध्यापकों व सहायक प्राध्यापकों के पढ़े गए रिसर्च को रेफर्ड जनरल में प्रकाशित रिसर्च मानकर उपकृत नहीं किया जा सकता है। वहीं शासकीय सेवा अवधि दो से तीन साल की होने पर भी पांच साल के प्राध्यापक का लाभ पूर्व में संविदा नौकरी के आधार पर नहीं दिया जा सकता है। नियमानुसार संविदा अवधि, सेमिनार में रिसर्च पाठन को पीएचडी गाइड बनाने का आधार बनाना ही गलत है।
रिसर्च समित पर भी उठ रहे सवाल
कुलसचिव जेपी मिश्रा की अधिसूचना में जो सहायक प्राध्यापक विभिन्न विषयों में शोध निदेशक बनाए गए हैं। उन्हें अबतक शासन के नियमानुसार नियमित ही नहीं किया गया है। क्योंकि उनकी परीवीक्षा अवधि ही समाप्त नहीं हुई है। न ही उनके दो रिसर्च पेपर रेफर्ड जनरल में प्रकाशित हुए हैं। जबकि ये दो पेपर पीएचडी के बाद प्रकाशित होना है, न की खुद की पीएचडी के रिसर्च पेपर का प्रकाशन गाइड बनने के उचित आधार है। लेकिन उसे विश्वविद्यालय की रिसर्च डिग्री समिति ने मान्य कर दिया है। इसके अलावा यूटीडी के विभागाध्यक्षों के पांच रिसर्च पेपर राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय रिफर्ड जनरल में प्रकाशित नहीं है। लेकिन कुलपति प्रोफेसर टीआर थापक की अध्यक्षता वाली रिसर्च एडवाइजरी कमेटी ने शोध निदेशकों की अनुशंसा कर दी। नियम कानून को ताक पर रखकर सहायक प्राध्यापकों को शोध निदेशक बनाने पर कुलसचिव व कुलपति पर ही गंभीर आरोप लग रहे हैं।
ऐसे शोध निदेशक बनाने से उठ रहे सवाल
विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा शोध निदेशक अधिसूचित किए गए सहायक प्राध्यापक फुल टाइम कैसे हो गए, जब उनकी नियुक्ति ही 2019 से 2021 के बीच हुई है। उदाहरण के लिए पुष्पेन्द्र सिंह विषय लॉ नियुक्ति वर्ष 2019, पीएचडी 2019, रश्मी यादव विषय समाजशा नियुक्ति वर्ष 2020, राम प्रकाश घुनेरिया पीएचड़ी 2020, नियुक्त 2019, शशिकांत अवस्थी पीएचडी 2020 नियुक्ति 2021, लेकिन इन्हें शोध निदेशक बनाया गया है। इसी तरह गुलाब घर विषय अंग्रेजी, नियुक्ति 2019, पायल लिलहरे विषय हिन्दी पीएचडी 2020, नियुक्ति 2020, वैशाली जैन समाजशास्त्र नियुक्त 2019 और पीएचड़ी 2021, कमलेश चौरसिया, दुर्गावति सिंह अंग्रेजी समेत 39 ऐसे नाम है जिनकी न तो परीवीक्षा अवधि समाप्त हुई है न पीएचड़ी के बाद इनके रिसर्च पेपर रेफर्ड जनरल में प्रकाशित हुए हैं। ई-सर्विस बुक में अभी भी प्रोबेशन पीरियड खत्म होने और नियमितीकरण का आदेश दर्ज नहीं है।
एक्सपर्ट व्यू
पांच वर्ष की नियमित सेवा अवधि, रेफ र्ड जनरल में शोध प्रकाशन अति अनिवार्य शर्तो में है। यदि इनका पालन नहीं किया गया है, तो किसी भी सूरत में ऐसे सहायक प्राध्यापकों को शोध निदेशक नहीं बनाया जा सकता। ये अति गंभीर मामला है। ऐसा गलत करने वाले विश्वविद्यालय के अधिकारी पर कार्रवाई हो सकती है।
राधाबल्लभ शर्मा, एक्सपर्ट, विश्वविद्यालयीन अध्यादेश
इनका कहना है
आपके द्वारा मामले की जानकारी मिली है। विश्वविद्यालय ने जो किया है, उसकी जांच करवाता हूं, जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
दीपक सिंह, आयुक्त उच्च शिक्षा
पांच साल की सेवा की शर्त अनिवार्य है। परीवीक्षाधीन सहायक प्राध्यापकों को शोध निदेशक बनाना नियमों का उल्लंघन है। मामले की जांच कर कार्रवाई की जाएगी।
धीरेन्द्र शुक्ल, ओएसडी, उच्च शिक्षा
जिन सहायक प्राध्यापकों को शोध निदेशक बनाया गया है। उनके परीवीक्षा अवधि के पत्र शासन को प्रेषित किए जा जा चुके हैं। शासकीय कामकाज है, विलंब होता है।
जेपी मिश्रा, कुलसचिव, छतरपुर विवि
Published on:
30 Jun 2022 11:23 am
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