
महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय
महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय (एमसीबीयू), छतरपुर एक बार फिर विवादों के घेरे में आ गया है। इस बार मामला विश्वविद्यालय अध्ययनशालाओं में शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए अध्यापन व्यवस्था हेतु निकाली गई संविदा और तदर्थ भर्तियों से जुड़ा है। आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और केंद्र सरकार के स्पष्ट निर्देशों को पूरी तरह ताक पर रखकर यह भर्ती विज्ञापन जारी किया है, जिससे आरक्षित वर्ग के अधिकारों पर सीधा डाका डाला जा रहा है। विश्वविद्यालय द्वारा 30 जुलाई 2026 को विज्ञापन क्रमांक/2288 जारी किया गया है। इसके तहत शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए विश्वविद्यालय की विभिन्न अध्ययनशालाओं में अध्यापन कार्य सुचारू रूप से संचालित करने के नाम पर अभ्यर्थियों से आवेदन आमंत्रित किए गए हैं।
विषय/विभाग: विश्वविद्यालय ने कुल 27 अध्ययनशालाओं/विभागों के लिए यह विज्ञापन निकाला है। इनमें कृषि, जैव प्रौद्योगिकी (बायोटेक्नोलॉजी), वनस्पति विज्ञान (बॉटनी), रसायन शास्त्र (केमिस्ट्री), वाणिज्य (कॉमर्स एवं प्रबंधन), कंप्यूटर साइंस, चित्रकला (ड्राइंग एवं पेंटिंग), अर्थशास्त्र, इलेक्ट्रॉनिक्स, अंग्रेजी, फोरेंसिक साइंस, भूगोल, भूविज्ञान (जियोलॉजी), हिंदी, इतिहास, पत्रकारिता एवं जनसंचार, विधि (कानून), गणित, संगीत, दर्शनशास्त्र, भौतिक शास्त्र (फिजिक्स), शारीरिक शिक्षा, राजनीति विज्ञान, संस्कृत, समाजशास्त्र/मनोविज्ञान, उर्दू और प्राणी शास्त्र (जूलॉजी) शामिल हैं।पद और चयन प्रक्रिया: विज्ञापन में स्पष्ट किया गया है कि यह प्रक्रिया सीधे नियुक्ति के लिए नहीं, बल्कि कार्य करने के इच्छुक अभ्यर्थियों का एक पैनल तैयार करने के लिए है। कार्यभार और अध्यापन की आवश्यकता के आधार पर पदों की संख्या को घटाने, बढ़ाने या समाप्त करने का संपूर्ण अधिकार विश्वविद्यालय के पास सुरक्षित रहेगा।
मानदेय की सीमा: अभ्यर्थियों को कार्यपरिषद की निर्णय अनुसार अधिकतम 800 रुपए प्रति कार्यदिवस की दर से प्रतिमाह अधिकतम 20,000 रुपए तक का मानदेय दिया जाएगा।
शैक्षणिक योग्यता: अभ्यर्थियों को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और राज्य सरकार के नियमों के अनुसार निर्धारित योग्यता (जैसे स्नातकोत्तर, राष्ट्रीय/राज्य पात्रता परीक्षा या पीएचडी) पूरी करना अनिवार्य है।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सचिव प्रो. मनीष आर जोशी द्वारा 16 फरवरी 2026 को देश के सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को एक पत्र भेजा गया था। इस निर्देश में भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के आदेशों का हवाला देते हुए पुन: दोहराया गया था कि यदि कोई भी संविदा या अस्थाई नियुक्ति 45 दिन या उससे अधिक अवधि के लिए की जा रही है, तो उसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए नियमानुसार आरक्षण लागू करना अनिवार्य है।
इसके बावजूद, महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति एवं कुलसचिव ने इस अनिवार्य निर्देश और सरकारी आरक्षण नियमावली की पूरी तरह अनदेखी करते हुए बिना किसी आरक्षण रोस्टर या आरक्षण तालिका के विज्ञापन जारी कर दिया। इससे आरक्षित वर्ग के योग्य अभ्यर्थियों को उनके संवैधानिक अधिकार से वंचित करने का गंभीर आरोप लग रहा है।
इस पूरे मामले पर जब विश्वविद्यालय के पूर्व कुलसचिव डॉ. पुष्पेन्द्र पटैरिया से चर्चा की गई, तो उन्होंने दोटूक शब्दों में कहा कि भारत सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि अस्थाई या संविदा स्तर पर की जाने वाली भर्तियों में भी आरक्षण प्रणाली का पालन किया जाना चाहिए था।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने पूर्व के शैक्षणिक सत्रों (2023-24 एवं 2024-25) में की गई संविदा भर्तियों का विवरण भी अपने ऑनलाइन पोर्टल पर मांगा है। इसके बावजूद नियमों को दरकिनार कर जारी किए गए इस भर्ती विज्ञापन से विश्वविद्यालय प्रशासन की नीयत पर सवाल खड़े हो गए हैं। छात्र संगठनों और आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों ने इस भर्ती प्रक्रिया को तत्काल रद्द कर आरक्षण नियमों के तहत नया विज्ञापन जारी करने की मांग की है।
इस संबंध में विश्वविद्यालय का पक्ष जानने के लिए पत्रिका ने कुलगुरू राकेश सिंह कुशवाह और कुलसचिव यशवंत सिंह पटेल से संपर्क किया। लेकिन दोनों ने ही इस संबंध में कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और चुप्पी साधे रहे।
Updated on:
11 Aug 2026 10:53 am
Published on:
11 Aug 2026 10:53 am
