
निर्माणाधीन स्वास्थ्य केंद्र
जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं चरमराई हुई हैं और स्वास्थ्य केंद्र संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। स्वास्थ्य को मद्देनजर रखते हुए अस्पतालों को स्वीकृति तो मिल गई, लेकिन भवन निर्माण में देरी होने से अभी लोगों को इलाज मुहैया नहीं हो पा रहा है। जिले में स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के लिए बनाए जा रहे अस्पताल और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति संतोषजनक नहीं है। कहीं निर्माण कार्य समय सीमा निकल जाने के बावजूद अधूरा पड़ा है, तो कहीं संसाधनों और स्टाफ की कमी के कारण संचालन शुरू नहीं हो पा रहा है। नौगांव, चंदला और बिजावर में बनाए जा रहे सिविल अस्पताल भवन और महाराजपुर में निर्माणाधीन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र इसका जीवंत उदाहरण हैं।
प्रदेश स्वास्थ्य विभाग ने बिजावर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का उन्नयन कर इसे सिविल अस्पताल स्वीकृत किया है। दो मंजिला भवन का निर्माण 11.5 करोड़ की लागत से पीआईयू द्वारा ठेकेदार के माध्यम से कराया जा रहा है। हालांकि कार्य की गति धीमी होने के कारण दिसंबर 2026 तक पूरा होने की संभावना कम लग रही है। इसमें पिलर खड़े करना, छत डालना, दीवारें बनाना, वार्ड, डॉक्टर कक्ष, स्टोर रूम सहित रंगाई-पुताई और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराना शामिल है। इसी प्रकार चंदला में बनने वाले सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में समय बीत जाने के बाद भी कार्य शुरु नहीं हो पाया है।
जिले के दूरस्थ अंचलों में स्वास्थ्य सुविधाएं मजबूत करने के उद्देश्य से बनाए गए उपस्वास्थ्य केंद्र आज खुद बदहाली का शिकार हैं। गौरिहार ब्लॉक के अंतर्गत स्वीकृत 34 उपस्वास्थ्य केंद्रों में से 9 केंद्र ऐसे हैं, जहां भवन तो बनकर तैयार हैं, लेकिन पिछले दो वर्षों से इन पर ताले लटके हुए हैं। कारण साफ है सीएचओ, एमपीडब्ल्यू और एएनएम जैसे आवश्यक स्वास्थ्य कर्मचारियों की अब तक नियुक्ति नहीं हो सकी है। इसका सीधा असर ग्रामीणों की सेहत पर पड़ रहा है।
नौगांव में 11.34 करोड़ की लागत से तैयार सिविल अस्पताल का लोकार्पण प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा किया जा चुका है। इसमें 50 मरीजों को एक साथ भर्ती करने की व्यवस्था, ऑपरेशन थिएटर, लेबर यूनिट, मेटरनिटी, सर्जिकल इंटेंसिव केयर यूनिट, नवजात शिशुओं के लिए न्यू बॉर्न मेडिकल, डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ रूम सहित स्टोर रूम बनाए गए हैं। लेकिन भवन हैंडओवर होने के दो माह बाद भी आवश्यक संसाधन और स्टाफ उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। इस अस्पताल को शुरू करने के लिए 9 विशेषज्ञ डॉक्टर, 5 मेडिकल ऑफिसर, एक दंत रोग विशेषज्ञ, 2 मेट्रन, 50 स्टाफ नर्स, एक नेत्र सहायक, 2 लैब टेक्नीशियन, एक रेडियोग्राफर, 4 फार्मासिस्ट और अन्य स्टाफ की आवश्यकता है।
ग्रामीणों का कहना है कि इन उपस्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से सर्दी, खांसी, बुखार, जुकाम, प्राथमिक उपचार, टीकाकरण, गर्भवती महिलाओं की जांच और बच्चों के पोषण से जुड़ी सेवाएं मिलनी थीं। केंद्र बंद होने के कारण अब छोटी-छोटी बीमारियों के इलाज के लिए भी लोगों को पड़ोसी जिले महोबा और बांदा के अस्पतालों का सहारा लेना पड़ रहा है। दूरी अधिक होने से समय और पैसे दोनों की परेशानी उठानी पड़ रही है। कई बार साधन न मिलने के कारण मरीज समय पर इलाज से वंचित रह जाते हैं।
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि जब कभी कोई विशेष स्वास्थ्य अभियान या कार्यक्रम आयोजित किया जाता है, तब आशा कार्यकर्ता और आशा सहयोगिनी ताले खुलवाकर औपचारिक रूप से कार्यक्रम करा देती हैं। इसके बाद फिर केंद्र बंद हो जाते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इस तरह की अस्थायी व्यवस्था से समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो पा रहा है। क्षेत्र के विधायक के मंत्री पद पर होने के बावजूद ग्रामीणों को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं, जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
निर्माण कार्य चल रहा है। जैसे ही प्रक्रिया पूरी होगी, अस्पताल का संचालन शुरू कर दिया जाएगा।
डॉ आरपी गुप्ता, सीएचएमओ
Published on:
14 Mar 2026 10:53 am
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