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भरतनाट्यम व कथक समागम से क्लासिकल नृत्य की दिखी अनूठी दुनिया

खजुराहो नृत्य समारोह: कलाकारों ने दी प्रस्तुतियां कुचिपुड़ी समूह नृत्य से गिरा 48 वें खजुराहो नृत्य समारोह की दूसरी शाम का पर्दा कंदरिया महादेव मंदिर के आंगन में सजीव हो उठा शिव-पार्वती का अर्धनारेश्वर स्वरुप  

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खजुराहो. खजुराहो नृत्य समारोह में दूसरी शाम की शुरुआत प्रसिद्ध नृत्यांगना सुजाता महापात्रा के ओडिसी नृत्य से हुई। ओडिसी नृत्य के जरिए शिव-पार्वती के अर्धनारेश्वर और शिव तांडव की मनमोहक प्रस्तुति दी। दूसरी प्रस्तुति में कौरवों के बीच पांडवों की पत्नी द्रोपदी की लाज बचाने की श्रीकृष्ण लीला का वर्णन ताल, लय के संगम के साथ प्रस्तुत किया गया। वहीं, हिरण्य कश्यप से प्रह्लाद के बचने के प्रसंग का वर्णन के साथ नृत्य समारोह के दूसरे दिन का पर्दा गिरा।

इसके बाद हरिहर नृत्य की प्रस्तुति हुई, जिसमें भगवान शिव और विष्णु के लक्षणों का गुणगान करते हुए विभिन्न लीलाओं और अवतारों का वर्णन नृत्य के माध्यम से दिखाया गया। भगवान विष्णु के शेषनाग को तो वहीं शिव के नागों के आभूषणों सहित अन्य प्रसंगों को सभी नर्तकों द्वारा शिव और विष्णु दोनों के भीतर से हरि और हर दोनों का स्वरूप एक ही निर्गुण निराकार दिखाया गया।

दूसरी प्रस्तुती के तीसरे पार्ट में विमानयान प्रस्तुत किया गया। जो कालिदास कृत रघुवंश महाकाव्य में निहित एक प्रसंग का नृत्यरूप है । लंकापति राक्षसराज रावण पर विजय प्राप्त करने के पश्चात देवी सीता,लक्ष्मण व अन्य वानर राक्षस मित्रों के सहित,श्री राम पुष्पक विमान में विराजकर अयोध्या के प्रति उड़ान भरते हैं। एक ओर जहां उनके वनवास काल की यात्रा कठिनाइयों से भरी थी,वही दूसरी ओर अयोध्या तक की उनकी निवर्तन यात्रा आकाश में अत्यंत सुखद थी। इस नृत्य प्रस्तुति में केवल उनके द्वारा देखे गए विविध जल-थल-वन-जनों का अवलोकन ही नहीं बल्कि प्रकृति के बृहद रूप को सामने पाकर उन दैवी दंपतियों के मन के भावाभिव्यक्ति का वर्णन भी किया गया।

शास्त्रीय संगीत की दो शैलियों का दिखा संगम
नृत्य समारोह में में निरूपमा तथा राजेन्द्र द्वारा भारत की दो शास्त्रीय संगीत शैलियां, उत्तर की हिन्दुस्तानी शैली एवं दक्षिण की कर्णाटक शैली के मिलाप पर आधारित समागम की प्रस्तुति से हुई। जिसमें नृत्यकार भरतनाट्यम नृत्य और कथक,दोनों नृत्य प्रकारों के धागों से चित्र-विचित्र रचनाओं को बुनते हैं। दोनों नृत्य प्रकारों के मध्य में स्थित समानताएं एवं अंतर को प्रकट करती है और अंत में मार्गी शैली में इन दोनों प्रकारों का संगम होता है।
कुचिपुड़ी नृत्य से दर्शाया प्रहलाद व हिरण्यकश्यप प्रसंग
दूसरे दिन की आखरी प्रस्तुति में जयरामा राव और टी रेड्डी लक्ष्मी,विदुषी,संगीता, संजना,रेशमा,तानिया,हासना तथा वैष्णवी द्वारा कुचिपुड़ी समूह नृत्य प्रस्तुत किया गया। जिसकी शुरुआत शिष्यगणों द्वारा गणेश वंदना से हुई। इसके बाद जयरामा राव द्वारा भक्त प्रह्लाद तथा हिरण्य कश्यप पर आधारित प्रसंग का वर्णन नृत्य की विधाओं के माध्यम से किया। इसके बाद भगवान कृष्ण की काली मर्दन लीला का प्रसंग दिखाया गया स्वर पल्लवी में राग में अभिनय को ढालते हुए पीतल की थाली पर नृत्य किया गया।