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इस तरह से लगाए संतरा बागान, मिलेगा बंपर उत्पादन

कृषि अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों ने दी किसानों को सलाह

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छिंदवाड़ा. चंदनगांव स्थित जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के आचंलिक कृषि अनुसंधान केन्द्र के वैज्ञानिक जिले के किसानों को संतरा बागान लगाने के लिए सलाह दे रहे हैं। दरअसल, जिले में निरंतर बढ़े संतरे के उत्पादन को बनाए रखने और किसानों को संतरा बागान लगाने का उचित मार्गदर्शन प्रदान किया जा रहा है। किसान वैज्ञानिकों की सामयिक सलाह अपनाकर संतरा बागान लगाकर लाभ ले सकते हैं।
आचंलिक कृषि अनुसंधान केंद्र चंदनगांव के सहसंचालक डॉ. वीके पराडकर और टीएमसी परियोजना समन्वयक डॉ. डीएन नांदेकर व उनकी टीम ने किसानों को सलाह दी है कि किसान संतरा बागान लगाने के पूर्व मिट्टी की जांच अवश्य कराएं। उन्होंने बताया कि खेत का समतल होना अति आवश्यक है। जमीन में उचित गहराई लगभग एक मीटर के साथ ही बलुई दोमट मृदा व उचित जल निकासी वाली भूमि उपयुक्त होती है। संतरा बागानों के लिए भूमि का पीएच 6.5 से 7.5 इसी 0.21-0.28, मुक्त चूना 11.4-18.2 प्रतिशत होना चाहिए।

कलम लेते समय बरतें ये सावधानी

उन्होंने संतरे के पौधे (कलम) खरीदने में बरती जाने वाली सावधानियों के सम्बंध में सलाह दी गई है कि संतरे के रोगमुक्त पौधे संरक्षित पौधशाला से ही लिए जाने चाहिए। यह पौधे फाइटोपथोरा फफूंद व विषाणु रोग से मुक्त होते हैं। रंगपुर लाइन या जम्बेरी मूलवृन्त पर तैयार कलमें किए गए पौधे लेने चाहिए। कलमें रोगमुक्त तथा सीधी बढ़ी होना चाहिए, जिनकी ऊंचाई लगभग 60 सेमी हो तथा मूलवृन्त पर जमीन की सतह से बडिंग 25 सेमी ऊंचाई पर की हो। इन कलमों में भरपूर तंतूमूल जड़े होना चाहिए, जमीन से निकालने में जड़ें टूटनी नहीं चाहिए तथा जड़ों पर जख्म नहीं होना चाहिए।

आज से मिलेंगे पौधे

बताया गया कि आंचलिक कृषि अनुसंधान केंद्र चंदनगांव में संतरे के उच्च गुणवत्ता के रोगरहित पौधे उपलब्ध हैं जो 11 जून से कृषकों को प्रथम आओ प्रथम पाओ पद्धति से उपलब्ध हो सकेंगे। संतरे के पौधे संरक्षित नर्सरी में मिट्टी के मिश्रण को सौर्यीकरण कर उचित मूलवृन्त तथा अच्छी किस्म की बडस्टीक का उपयोग कर तैयार किए गए हैं।

बारिश का पानी इन पौधों के पास जमा न होने पाए

आचंलिक कृषि अनुसंधान केन्द्र चंदनगांव के सह संचालक डॉ. पराडकर, टीएमसी परियोजना समन्वयक डॉ. नांदेकर व उनकी टीम ने बताया कि संतरे के पौधे लगाने के लिए दा रेखांकन पद्धति का उपयोग होता है। वर्गाकार एवं षटभुजाकार पद्धति में 15 प्रतिशत पौधे वर्गाकार पद्धति की तुलना में अधिक लगाए जा सकते हंै। गढ्ढे का आकार 75 गुणा 75 गुणा 75 सेमी तथा पौधे को 6 गुणा 6 मीटर की दूरी पर लगाना चाहिए। इस प्रकार एक हैक्टेयर में 277 पौधे लगाए जा सकते हैं। मध्य भूमि में 5.5 गुणा 5.5 मीटर अथवा 5 गुणा 5 मी. अंतर पर 300 से 400 पौधे लगाए जा सकते हैं। गढ्ढे भरने के लिए ऊपर वाली आधी मिट्टी के साथ 20 किग्रा गोबर की सड़ी हुई खाद, 500 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट, 500 ग्राम नीम खली तथा 10 ग्राम कार्बेन्डाजिम का मिश्रण बनाना चाहिए। गड्डे में दीमक नियंत्रण के लिए पांच एमएल क्लोरपायरीफास का स्प्रे सभी ओर करने के बाद गड्डे को ऊपर तक इस मिश्रण से भर दें, ताकि बारिश का पानी इन गड्डों में जमा न होने पाए और इनके बीचों-बीच एक-एक खूंटी लगा दें। इस प्रकार किसान तैयार गड्ढे में जुलाई माह में उचित वर्षा होने पर रोगरहित प्रमाणित रोप वाटिका (नर्सरी) से अच्छी गुणवत्ता वाले रंगपुर या जम्बेरी मूलवृन्त पर तैयार संतरे के पौधे लगाकर संतरा बागान स्थापित कर सकते हैं।
उन्होंने सलाह दी है कि पौधों को लगाने के पूर्व उनका उपचार करना चाहिए। खुली नर्सरी प्राप्त जमीन पर लगे हुए पौधे की जड़ों को मेटालेक्जिल 2.75 ग्राम तथा कार्बेन्डेजिम एक ग्राम प्रति लीटर में घोल बनाकर पौधा लगाने के पहले 10.15 मिनट तक डुबोना चाहिए। पौधे लगाने के लिए जुलाई से सितम्बर माह का समय उपयुक्त होता है। ध्यान रहे कि कली का जोड़ जमीन की सतह से 25 सेंटीमीटर ऊपर रहे।