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Artist: निर्देशक ने नाट्य कलाकारों से कही यह बात, आपके भी आएगी काम

नाट्यशास्त्र और नाट्यकला के सूक्ष्म पहलुओं पर प्रकाश डाला।

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Artist: निर्देशक ने नाट्य कलाकारों से कही यह बात, आपके भी आएगी काम

Artist: निर्देशक ने नाट्य कलाकारों से कही यह बात, आपके भी आएगी काम


छिंदवाड़ा. नाट्यगंगा द्वारा आयोजित एक्टिंग की ऑनलाइन पाठशाला के 27वें दिन मुख्य अतिथि नाट्य निर्देशक अर्जुन देव चारण ने प्रतिभागियों को मार्गदर्शन दिया। उन्होंने नाट्यशास्त्र और नाट्यकला के सूक्ष्म पहलुओं पर प्रकाश डाला। प्रतिभागियों को उन बिंदुओं से अवगत कराया जो हर एक कलाकार के लिए बेहद ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने नाट्य शास्त्र के पहले अध्याय में दी गई नाटक की परिभाषा का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ‘नाट्य’ त्रिलोक के भावों का अनुकीर्तन है। भारतीय नाट्य परम्परा आध्यात्मिक सुख की बात करती है न कि दैहिक सुख की। उन्होंने कहा कि रंगकर्म में रंग का अर्थ जब तक हम नहीं समझ लेते उसकी सामाजिकता भी समझना कठिन है। रंगकर्म में रंग का अर्थ रंजन होता है, रंगकर्मी समाज का रंजन करता है और हर युग में रंजन करना सबसे मुश्किल काम है। जब नाटक को देखते हुए दर्शक पात्रों के साथ हंसने या रोने लगता है, ये ही रंजन की प्रक्रिया है। मुख्य अतिथि ने प्रतिभागियों के मन से इस भ्रांति को भी दूर किया कि आध्यात्म धर्म से जुड़ा है। उन्होंने बताया कि आध्यात्म व्यक्ति का स्वभाव है। इसलिए लोक, वेद और अभिनेता का स्वभाव नाटक के ब्रह्मंड माने जाते हैं। एक अभिनेता जब अपने आप को किसी नाटक के चरित्र में बदलता है तो वह अपना मूल स्वभाव छोडकऱ चरित्र के स्वभाव को ओढ़ लेता है, साथ ही जब हम नाटकों को करते हैं तो हर नाटक करते समय हमारी सामाजिक दृष्टि अलग होती है। रंगकर्म को अपनी हर प्रस्तुति में अपना सामाजिक सरोकार सिद्ध करना होता है। यदि यह सरोकार प्रेक्षकों तक नहीं पहुंचते हैं तो ये नाटक की असफलता है। एक अच्छी नाट्य प्रस्तुति देखने के बाद दर्शक वह नहीं रह जाता जो वह नाटक देखने से पहले था। वह बदल जाता है। उसकी संर्कीर्णता दूर हो जाती है। कार्यशाला का संचालन सुमित गुप्ता एवं आभार मानसी मटकर ने व्यक्त किया। इस अवसर पर अतिथि जमुना अइयर, विनोद विश्वकर्मा, दीपक, केशव कैथवास मौजूद रहे।

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