
इन मानसिक मतिमंदों की बुद्धि देख हो जाएंगे हतप्रभ
छिंदवाड़ा . किसी ने सही कहा है कि रिश्ते दिमाग से नहीं दिल से निभाए जाते हैं। या यूं कह लें कि प्रेम दिमाग नहीं दिल की भाषा समझता है। इस अहसास में न तो सोचने की जरूरत है न ही समझने की, सिर्फ महसूस करना होता है। तभी तो दो ऐसे इंसान जिनमें न तो दुनिया को समझने की काबिलियत है न ही रिश्तों को आंकने की ताकत, फिर भी वे एक दूसरे की फिक्र इस तरह से करते हैं जैसे उन्हें एक दूसरे की कमियों को पूरा करने के लिए ही इस दुनियां में भेजा गया हो।
हम बात कर रहे हैं उन दो भाइयों की जिनकी उम्र तो बढ़ी लेकिन बौद्धिक विकास अब भी महज दो-तीन वर्ष के बच्चों जैसा ही है। ईश्वर की विडम्बना तो देखिए वर्तमान में जहां लोग रिश्तों और इंसानियत को भूल बैठे हंै, वहीं ये मानसिक मंद दोनों भाई एक-दूसरे के लिए मिसाल साबित हो रहे हैं। पिता ने बताया कि बड़ा बेटा बचपन में पलंग से गिर गया था। इस वजह से उसका बौद्धिक विकास थम गया। वहीं दूसरा जन्म से ही मतिमंद है। दुनिया के रंजोगम से अनजान दोनों भाई हर वक्त एक-दूसरे के साथ ही बिताते हैं। उनकी यही खासियत सामान्य लोगों को आकर्षित और सोचने पर मजबूर करती है।
बिछुआ निवासी बाबूलाल ने बताया कि उनके तीन पुत्र हैं। इनमें से सबसे बड़ा तथा सबसे छोटा बच्चा मानसिक रोगी है। गांव में संचालित एक एनजीओ की मदद से शुक्रवार को वे बच्चों को इलाज के लिए लेकर छिंदवाड़ा आए थे। उन्होंने बताया कि खेती-किसानी कर घर का पालन-पोषण करते हंै। इसलिए बच्चों की उच्चस्तरीय उपचार के लिए असक्षम हैं। हालांकि दोनों बच्चों को शासन की ओर से पेंशन मिलती है।
गांव में हैं 100 से ज्यादा दिव्यांग
बताया जाता है कि बिछुआ के चयनित ३० गांव ऐसे हंै जहां १०० से ज्यादा दिव्यांग विभिन्न रोगों से बाधित हैं। इसमें मानसिक, अस्थि, शारीरिक, मूक बाधित आदि शामिल हंै। गांव में नागपुर की एक एनजीओ संस्था दिव्यांगों की मदद करती है तथा समय-समय पर इनके उपचार आदि के लिए छिंदवाड़ा लाया जाता है। बताया जाता है कि दिव्यांगों से सम्बंधित जिला अस्पताल में ५० तरह की दवाएं उपलब्ध होना चाहिए। लेकिन छिंदवाड़ा में नाम मात्र की ही दवा मिल पाती है।
Published on:
28 Oct 2017 12:16 pm
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