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संतरा, कपास और मक्का तीनों बिगाड़ सकते हैं चुनावी समीकरण

उद्योगों की बजाई डुगडुगी दिखा सकती है चुनाव में असर, किसानों की मुश्किल इस विधानसभा चुनाव में बन सकता है बड़ा मुद्दा

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Chhindwara assembly election-2018

Chhindwara assembly election-2018

छिंदवाड़ा. संतरे की रंगत, मक्का की चमक और कपास की सफेदी यूं तो सबको पसंद है। तीनों का जिले से गहरा नाता भी है। फिलहाल इनसे जुड़े मुद्दों को भले ही स्थानीय नेता नजरअंदाज कर दें, लेकिन इस विधानसभा चुनाव में ये बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। सौंसर और पांढुर्ना का संतरा और कपास प्रदेश सहित महाराष्ट्र में भी नाम रखता है तो मक्का ने पिछले कुछ समय में जिले का नाम देशभर में फैलाया है।
स्थानीय नेता और सरकार इस चुनाव में इनको लेकर वोट मांगने के लिए निकलेंगे, लेकिन इन मुख्य कृषि उत्पादों के भविष्य पर मंडराते संकट ने किसानों को मुश्किल में डाल रखा है और वे चुनाव में इसे मुद्दा बनाने की फिराक में हैं।
ध्यान रहे नागपुरी ऑरेंज के नाम से पांढुर्ना-सौंसर का संतरा एक समय पूरे देश में प्रसिद्ध था, लेकिन क्षेत्र में लगातार गिरते जलस्तर और महंगी होती खेती के कारण किसानों का रुझान संतरे से हट रहा है। पांंढुर्ना में तो किसान अपने संतरे के बगीचे में गोभी लगा रहे हैं। यहां संतरे का रकबा लगातार घट रहा है। पूरे जिले में संतरे का रकबा सिर्फ 25 हजार हैक्टेयर पर सिमट कर रह गया है। इसका सबसे बड़ा कारण संतरांचल में लगातार होती पानी की कमी है। इसके समाधान के लिए न तो स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने रुचि दिखाई न सरकार ने कोई योजना बनाई। यही हाल कपास का भी है। जीनिंग मिल लगातार बंद हो रही है। किसान अपना कपास नागपुर ले जाने के लिए मजबूर हैं।
आइसीसी की खरीदी के लिए किसानों को हर साल हाथ पैर जोडऩे पड़ते हैं। 2008 में यहां टैक्सटाइल पार्क बनाने की घोषणा की गई थी। जमीन अधिग्रहित की गई। बड़े उद्योगों के आने की डुगडुगी बजाई गई, लेकिन मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं कराई गईं। हाल ये हुआ कि बड़ी कम्पनियों ने अपने हाथ खींच लिए। क्षेत्रीय किसान और व्यापारियों ने अब इसे मुद्दा बन लिया तो मुश्किल हो सकती है सत्ताधारी दल और विपक्षी दलों को।
मक्का की उपलब्धियों को लेकर फूले नहीं समा रहे नेता और सरकार किसानों की चिंता को समझ नहीं पा रहे हैं। बम्पर उत्पादन के कारण बाजार में भाव औंधे मुंह गिरेंगे, इस ओर किसी का ध्यान नहीं है। सरकार ने भावांतर का झुनझुना फिर पकड़ाया है उसमें अभी कई पेंच हैं। पिछले बार भी गरीब किसानों का मक्का चतुर व्यापारियों और बिचौलियों ने 800 रुपए क्विंटल में खरीद लिया था। इस बार तो उत्पादन और ज्यादा होगा।
एेसे में हालात क्या होंगे समझा जा सकता है। जो समझ रहे हैं वे किसानों को समझा रहे हैं। वे समझ गए तो पिछले साल की परेशानी और पीड़ा नेताओं को मुश्किल में डाल सकती है।

ये बन सकते हैं मुद्दे
क्षेत्र के संतरा उत्पादक किसान रामू बारंगे का कहना है कि पानी की कमी और सही दाम नहीं मिलने के कारण किसानों को संतरा छोडक़र दूसरी फसलों की ओर मुडऩा पड़ रहा है। ऑरेंज सिटी बनाने की बात सरकार कह रही है, लेकिन पांढुर्ना में संतरा का रकबा कम होता जा रहा है। कपास उत्पादक किसान रोशन पराडकर का कहना है कि फिलहाल कपास का उत्पादन ठीक है क्षेत्र में, लेकिन उसकी प्रोसेसिंग को लेकर न स्थानीय नेता न ही सरकार चिंतित है। लोकल में जीनिंग फैक्ट्रियां अंतिम सांस ले रहीं हैं। यह किसानों के साथ छोटे और मझले व्यापारियों के लिए भी चिंता का विषय है। सीसीआइ की ही खरीदी होनी चाहिए ताकि किसानों को मुनाफा तो हो वरना वे क्यों लगाएंगे। इस सम्बंध में किसान नेता सरकार की योजनाओं को गलत बताते हैं। किसान प्रकोष्ठ के नेता हरनाम सिंह सेंगर कहते हैं कि सरकार किसानों को उचित भाव दिलाने के लिए योजनाओं का ढोंग कर रही है। न किसान की इनकम बढ़ रही है न व्यापारियों को लाभ हो रहा है। संतरे को सुरक्षित रखने कोई ठोस योजना बनी न कपास के लिए ।

कपास
जिले में कपास का उत्पादन भी प्रमुख है। वर्तमान में 50 हजार हैक्टेयर क्षेत्र में कपास का उत्पादन हो रहा है। इसके दामों को लेकर किसान सालों से संघर्षरत हैं। स्थानीय स्तर पर देखें तो लोकल में जीनिंग फैक्ट्रियां दम तोड़ रहीं हैं क्योंकि व्यापार महंगा हो रहा है। किसानों की दामों को लेकर समस्याएं हैं जो सुलझ नहीं रही हैं या सुलझाया नहीं जा रहा।

मक्का
प्रदेश में सबसे ज्यादा मक्का उत्पादन छिंदवाड़ा में हो रहा है। देश में भी जिले ने नाम किया है इसमें। इस साल दो लाख 65 हजार हैक्टेयर तक पहुंच चुका है रकबा। इस बार 12 लाख क्विंटल से ज्यादा उत्पादन का अनुमान, लेकिन ज्यादा उत्पादन के कारण भाव और गिरने की सम्भावना है। सरकार ने 1700 रुपए प्रति क्विंटल न्यूनतम भाव तय किया है।

संतरा
जिले में पांढुर्ना और सौंसर संतरा उत्पादन के प्रमुख क्षेत्र माने जाते हैं। जिले में लगभग 25 हजार हैक्टेयर क्षेत्र में संतरा के बगीचे हैं। नागपुरी ऑरेंज के नाम से मशहूर यहां के संतरे की डिमांड दूसरे प्रदेशों तक में है, लेकिन पांढुर्ना क्षेत्र में संतरा का रकबा सिमट रहा है। क्षेत्र में गिरता भू-जल स्तर और जलसंकट इस उद्योग को संकट में डाल रहा है।