
प्रदेश की सबसे हॉट सीट छिंदवाड़ा पर सबकी नजर है। भाजपा नेतृत्व कमलनाथ के गढ़ को भेदने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है। भाजपा ने विधायक कमलेश शाह, महापौर विक्रम अहके समेत बड़ी संख्या में कांग्रेस नेताओं को अपने खेमे में तो कर लिया है, लेकिन मतदाताओं की खामोशी ने बेचैनी बढ़ा दी है। दलबदल की राजनीति में मुद्दे गायब हो गए हैं। उधर, कमलनाथ का पूरा परिवार वोटर्स को साधने में जुटा है। कांग्रेस प्रत्याशी नकुलनाथ और उनकी पत्नी प्रियानाथ सुबह से शाम क्षेत्र में पसीना बहा रहे हैं। कमलनाथ सामाजिक संगठनों के साथ बैठक कर जीत की रणनीति बना रहे हैं। भाजपा प्रत्याशी विवेक बंटी साहू को युवा कार्यकर्ताओं पर भरोसा है। बंटी का परिवार भी चुनाव प्रचार की कमान संभाल रहा है।
इन मुद्दों पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत
ग्रामीण क्षेत्रों में सडक़ बिजली, पानी जैसी सुविधाओं का विस्तार नहीं।
पातालकोट में प्राकृतिक जलस्रोत सूखने के कगार पर।
जिले में संतरा, वन औषधियां प्रचुर मात्रा में, लेकिन उद्योग-धंधे नहीं
व्यवसायिक शिक्षा के लिए क्षेत्र दूसरे शहरों पर आश्रित।
कृषि और इंजीनियरिंग कॉलेज की लंबे समय से मांग।
छिंदवाड़ा को संभाग बनने का सपना आज भी लोग देख रहे।
सभी खेतों तक सिंचाई की सुविधा नहीं।
लंबी दूरी की ट्रेनों का लंबे समय से इंतजार।
नई कोयला खदानों को खोलने पर विचार नहीं।
पांच साल के विकास का विजन नहीं
लोकसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस की लड़ाई दल-बदल पर केंद्रित हो चली है। जनसभाओं में कहीं श्रीराम मंदिर और मोदी सरकार का जिक्र है तो कहीं भावनात्मक स्तर पर 45 साल के आपसी संबंध बनाए रखने की बात कही जा रही है। दोनों प्रमुख दल अगले पांच साल में छिंदवाड़ा-पांढुर्ना जिले के विकास की दिशा में क्या करेंगे, कौन सा प्रोजेक्ट लेकर आएंगे, शिक्षा, रोजगार, उद्योग में युवाओं के भविष्य के लिए उनके पास कौन सा प्लान है, आदि के बारे में नहीं बता पा रहे। प्रचार-प्रसार के सभा मंचों पर भी इसका जिक्र नहीं हो पा रहा।
विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 97 हजार ज्यादा वोट
नवंबर 2023 में हुए विधानसभा चुनाव में सातों सीट से कांग्रेस ने 97 हजार वोट के अंतर से भाजपा को परास्त किया था। सबसे ज्यादा अंतर छिंदवाड़ा से तो सबसे कम परासिया विधानसभा से था। छिंदवाड़ा में कमलनाथ ने 36 हजार वोट से जीत दर्ज की थी। अमरवाड़ा के कमलेश शाह ने भाजपा की मोनिका बट्टी को 25 हजार वोट से हराया था। सौंसर और पांढुर्ना में कांग्रेस की जीत 10-11 हजार वोट से थी। जुन्नारदेव, परासिया और चौरई में जीत का अंतर दस हजार वोट के अंदर सिमट गया था। सातों विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस को 6.78 लाख और भाजपा को 5.81 लाख वोट मिले थे।
कभी कम तो कभी अचानक बढ़ा जीत का अंतर
संसदीय इतिहास देखें तो विजेता उम्मीदवार की जीत का अंतर कभी कम तो कभी ज्यादा रहा। 1999 में जब कमलनाथ के खिलाफ भाजपा ने संतोष जैन को उतारा तो जीत का अंतर सर्वाधिक 1.88 लाख मत था। सबसे कम 1977 के चुनाव में था। इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव में छिंदवाड़ा अकेली सीट थी, जिसने कांग्रेस के इस गढ़ को 2367 वोट से आगे रखा। ये भी अपने आपमें रिकॉर्ड है। 1962, 1971, 1996 के चुनाव में जीत का अंतर 25 हजार से कम रहा। शेष चुनाव में जीत के रिकॉर्ड बनते रहे।
Published on:
06 Apr 2024 07:35 pm
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