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CRIME: फल बेचने वाले ने खोला राज, हो सकती हैं कई बीमारियां, पढ़ें पूरी खबर

सरकार ने इस पर रोक लगा रखी है।

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CRIME: फल बेचने वाले ने खोला राज, हो सकती हैं कई बीमारियां, पढ़ें पूरी खबर

CRIME: फल बेचने वाले ने खोला राज, हो सकती हैं कई बीमारियां, पढ़ें पूरी खबर

छिंदवाड़ा. खेती के अलावा रसायन के प्रयोग धड़ल्ले से कच्चे फलों को समय से पहले पकाने में हो रहा है। यही नहीं व्यापारी धड़ल्ले से रासायनिक पदार्थ से फलों को पकाकर बेच रहे हैं। जबकि सरकार ने इस पर रोक लगा रखी है। हैरानी की बात यह है कि जिम्मेदार विभाग ने तीन साल से फलों की दुकान से कोई सेम्पल नहीं लिया है और न ही कार्यवाही की है। बुधवार को ‘पत्रिका’ ने जब पड़ताल की तो मामला उजागर हुआ। एक फल व्यापारी ने बताया कि पपीता, आम, केला सहित अधिकतर फलों को कार्बाइड जैसे रासायनिक पदार्थ से पका रहे हैं। यह उनकी मजबूरी है। अगर वह ऐसा नहीं करेंगे तो फल जल्दी से नहीं पकेंगे और उनका व्यापार रूक जाएगा। बड़ी बात यह है कि आम आदमी बाजार से रोजाना फल खरीद कर स्वाद तो चख रहा है, लेकिन उसे यह नहीं मालूम कि उसे पकाने और रसीला बनाने के लिए कितने प्रकार के रसायनों का प्रयोग हो रहा है और इससे उसे क्या नुकसान हो सकता है। जानकारों का कहना है कि फल पकाने का परंपरागत तरीका भूसे और पत्ते के बीच पाला लगाने का है। इस विधि से फल धीरे-धीरे 48 घंटे में पकते हैं। इसके अलावा आधुनिक तकनीक भी है। पत्रिका पड़ताल के दौरान एक भी ऐसा फल व्यापारी नहीं मिला जो इस तकनीक का इस्तेमाल कर रहा हो। अधिकांश फल व्यापारी कम समय में अधिक लाभ कमाने की खातिर केमिकल का उपयोग करने में लगे हैं। जानकारों की मानें तो भूसे और पत्ते से पकाए गए फलों का शरीर पर कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता, जबकि कार्बाइड में बेहद गर्मी होती है। इसलिए इससे पके फल को खाने से शरीर रोगों से ग्रसित हो सकता है। हालांकि सरकार ने इसका उपयोग खाद्य-पदार्थो के लिए गैर कानूनी घोषित किया है। लेकिन इसके बावजूद फल मंडी और बाजार में लगने वाली मंडियों में इसका प्रयोग खुलेआम देखा जा सकता है।


ऐसे पकते हैं कच्चे फल
व्यापारी बाहर से कच्चे फल मंगाते हैं। उन फलों को दुकानों और गोदामों में कार्बाइड की पुडिय़ा बनाकर रख देते हैं, जिससे फलों को पकाया जाता है। कार्बाइड चूने की तरह होता है, जो हवा के संपर्क में आते ही तेज गर्मी पैदा करता है। कार्बाइड से 12 से 24 घंटे में फल पक जाते हैं।


एक नहीं कई रसायन का प्रयोग
पत्रिका ने बुधवार को शहर में थोक व चिल्हर फल व्यवसायियों के बीच जाकर पड़ताल की। उनके फल पकाने की तकनीक को जाना और पाया कि उनके द्वारा उपयोग किए जा रहे रसायन का कोई मापदंड नहीं है। कार्बाइड की अलग-अलग पुडिय़ा बनाकर केले के बीच रख कर केला पका रहे हैं। कुछ व्यवसायी इथ्रेल 39 के घोल में फलों को डुबाकर फल पका रहे हैं। कुछ व्यवसायी ऐसे हैं जो गैस का प्रयोग कर रहे हैं। इस तकनीक को लेकर जब स्थानीय विशेषज्ञों से जब बात की तो यह बात सामने आई की कार्बाइड और इथ्रेल की अधिकता से कैंसर की संभावना बढ़ जाती है। दोनों ही एक तरह के रसायन है, सिर्फ इनके नाम में अंतर है। पानी के संपर्क में आते ही दोनों एथिलीन गैस रिलीज करती है, जिससे फल समय से पहले पक जाते हैं। जो कि मानव शरीर के लिए बेहद नुकसानदायक है।

हो सकती हैं कई बीमारियां

- प्रतिरोधक क्षमता कम होती है
-अधिक उपयोग करने पर कैंसर हो सकता है।
-लगातार सेवन करने से लीवर डेमेज का खतरा रहता है।
-गुर्दे में खराबी।
-शरीर में एलर्जी की समस्या।
-पेट की परत में छाले।
-फलों में पाए जाने वाले प्राकृतिक पौष्टिक तत्वों की कमी।
-पेट दर्द और उल्टी-दस्त की शिकायत।

ऐसे करें पहचान
केमिकल से पके फलों की पहचान काफी मुश्किल है। विशेषज्ञों के अनुसार कार्बाइड से पकाए गए फल पूरी तरह से नहीं पक पाते हैं। इसकी पहचान ध्यान से देखने से हो सकती है। यह फल ऊपर से पके अंदर से अधपक्के होते हैं। वहीं इनका रंग भी प्राकृतिक रूप से पके फलों की अपेक्षा तेज होता है। फलों को हाथ में लेकर तेज रंगों को देखकर इनकी पहचान की जा सकती है। फलों को कार्बाइड से पकाने पर फलों में विटामिन की मात्रा कम हो जाती है। ऐसे में लोगों को सावधानी बरतते हुए केमिकल युक्त फल के सेवन से परहेज करना चाहिए। लोगों को फलों को खरीदने के 24 घंटे बाद ही साफ पानी से अच्छी तरह धोकर उपयोग करना चाहिए।

शरीर पर पड़ता है दुष्प्रभाव
एमडी मेडिसिन डॉ. दिनेश ठाकुर का कहना है कि रासायनिक पदार्थों का उपयोग हर तरीके से नुकसानदायक है। इसके उपयोग से शरीर के सभी अंगों पर प्रभाव पड़ सकता है। इससे कई बीमारियां भी हो सकती हैं। कार्बाइड का इस्तेमाल से कैंसर जैसे रोग हो सकता है। इससे पेट संबंधी समस्याएं, किडनी, एलर्जी व त्वचा संबंधी रोग पैदा हो सकते हैं।


व्यापारी कर सकते हैं यह उपाय
विशेषज्ञों के अनुसार फलों को बिना किसी लेप या फिर गैस के भी पकाया जा सकता है। इसके लिए घरेलू तकनीक का इस्तेमाल कर फलों को पैरा चांवल या फिर भूसे में दबाकर पकाया जा सकता है। इसके अलावा फलों को पकाने की राइपनिंग तकनीक सबसे आधुनिक और नुकसान रहित मानी गई है। इस तकनीक में छोटे-छोटे चैंबर वाला कोल्ड स्टोरेज बना कर फलों को रखा जाता है। और उनमें एथिलीन छोड़ दी जाती है। इससे फल पकने लगते हैं। इससे फलों में घातक केमिकल भी नहीं मिल पाते और क्वालिटी भी बेहतर रहती है।

इनका कहना है...
पांढुर्णा में तीन साल पहले जांच हुई थी। वहां पर फलों के पकाने एवं फैक करने का तरीका वैधानिक पाया गया था। आपने ध्यान दिलाया है तो शहर में जांच की जाएगी। अगर रासायनिक पदार्थ से फल को पकाया जा रहा है तो यह गलत है। प्रिवेंशन ऑफ फुड अडेप्टेशन एक्ट 1955 की धारा 44 ए के तहत फलों में कार्बन गैस का उपयोग मना है। ऐसा करने पर छह माह कैद और एक हजार रुपए जुर्माना का प्रावधान है। कार्बाइड बीमारी का कारक है।

पुरुषोत्तम भदौरिया, खाद्य सुरक्षा अधिकारी