
There will be a change in the urban bodies
छिंदवाड़ा.पहले तो प्रमोशन फिर नई पोस्टिंग। उत्साह और उमंग से भरे मूड में दफ्तर टूटा मिल जाए तो स्वाभाविक है मन तो खराब हो ही जाएगा। इसका दोष तो पुराने साहब को ही देना पड़ेगा। इंतजार भी नहीं किया और अच्छे खासे दफ्तर को तोड़कर पोस्टिंग के एक दिन पहले भूमिपूजन कर दिया। अब मिर्ची तो लगेगी ही। मातहत अफसर आलीशान चैम्बर में बैठेंगे और बेचारे खंडहर में। काम में तो मन नहीं लगेगा। खजरी चौक के पान-ठेेलों में नए साहब के मन की यहीं बात चल रही है। चर्चा में यह व्यंग भी है-नए देर सबेर इस दर्द से उबर ही जाएंगे। पुराने तो अपनी मेहनत का फल ले गए।
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एक से सुनो दूसरे से निकालो
यूपी के मंत्री दूसरी बार मुख्यालय आए तो नेताओं-कार्यकर्ताओं की खूब क्लास ली। चिल्लाए,बड़बड़ाए और नसीहत भी दी-फील्ड पर जाओ,रात्रि विश्राम करो,विपक्ष के मुखिया की जड़ें उखाड़ दो और ना जाने कितनी बातें की। अब कार्यकर्ता भी क्या करते। अनुशासन में बंधे होने से हां में हां मिलाते रहे। पार्टी दफ्तर से बाहर निकले तो किसी ने विपक्ष के नमक का ध्यान रखते हुए तुरंत पूरा का पूरा भाषण सुना दिया। कुछ रह गए तो गपशप में लग गए। कुछ गंभीर थे तो आपस में कह बैठे-चुनाव का माहौल है यार,एक से सुनो तो दूसरे से निकाल दो। अभी तो एेसे ढेर आएंगे,बकबक तो सुननी ही पड़ेगी।
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एक-दूसरे पर नजर
चुनाव जैसे-जैसे करीब आते हैं नेताओं की बेचैनी भी बढ़ती जाती है। अपने काम पर तो ठीक सामने वाले पर ज्यादा नजर रहती है कि वह क्या कर रहा है। इन दिनों भैया के जनसम्पर्क की चर्चा पार्टी कार्यालय में कम पुराने बैल बाजार में ज्यादा हो रही है। कहा जा रहा है लोग क्या कह रहे हैं ये सूचना भी इकत्र की जा रही है। भैया पिछले पांच साल के सूखे को फिर हरा-भरा करने के इरादा लिए निकल पड़े हैं। हालांकि जो अभी मजे में हैं उनके पीछे किसी तीसरे की नजर लगी हुई है।
रिस्क लेने का नई
जिला मुख्यालय में बैठे एक अधिकारी इन दिनों फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं। विभाग में निर्माण के लिए पैसा आया है। काम तो पूरे जिले में होना है। उन्होंने साफ कह दिया है पहले प्रोजेक्ट और नक्शा दिखाओ, उसे ओके करने के बाद ही निर्माण शुरू होगा। साहब का कहना है कि रिस्क लेने का नहीं। दरअसल, काम के मामले में जिले की रिपोर्ट पर कुछ समय से लाल गोले लग रहे हैं। साहब अब उन पर ज्यादा नकेल कसने में लगे हैं जिनसे वे सबसे ज्यादा परेशान हैं। नीचे के अफसर भी समझ रहे हैं कि साहब के तेवर क्यों बदल रहे हैं। फिलहाल साहब रोज नसीहत दे रहे हैं।
-मनोहर सोनी,संदीप चवरे
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Published on:
13 Aug 2018 11:21 am
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