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हर समय मिल रही चुनौती, फिर भी कद्रदानों की वजह से आज भी जिंदा है यह आर्ट

हाथकरघा दिवस पर विशेष: छिंदवाड़ा शहर से सिमटा हैण्डलूम, सौंसर के बुनकरों के भरोसे पारम्परिक कला

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Handloom day today

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छिंदवाड़ा. रेडीमेड कपड़ों से हस्तशिल्प को हर समय चुनौती मिल रही है, लेकिन कद्रदानों और शौकीनों की मांग के चलते यह पारम्परिक कला जिंदा है। छिंदवाड़ा शहर में तो हथकरघा पर ताले लग गए हैं। केवल सौंसर, लोधीखेड़ा और मोहखेड़ के बुनकर कलाकार कोसा सिल्क, साड़ी और कॉटन उत्पाद के निर्माण से दो जून की रोटी का इंतजाम कर रहे हैं। इस हस्तकला को अगर सरकारी टूरिज्म से जोड़ दिया जाए तो कलाकारों को प्रोत्साहन के साथ अच्छी आर्थिक मदद दिलाई जा सकती है। राष्ट्रीय हाथकरघा दिवस सात अगस्त के मौके पर यह कहना है इस व्यवसाय से जुड़े कलाकारों का।
एक समय था जब शहर के पुराना छापाखापा के ज्यादातर घरों में हथकरघा से कपड़ा, साडिय़ां तैयार होती थीं। इससे दो हजार लोगों की आजीविका चलती थी। समय के साथ आधुनिक मशीनों से कपड़ा तैयार होने और रेडीमेड का चलन ज्यादा होने से हाथकरघा पर ताले लग गए। बुनकर कलाकार पलायन कर गए या उन्होंने व्यवसाय बदल दिया। सिर्फ सौंसर, लोधीखेड़ा और मोहगांव के 850 बुनकर परिवार इस पारम्परिक कला को जीवित रखे हुए हैं। उन्हें उत्पाद की मार्केटिंग में हस्तशिल्प विकास निगम का सहारा है तो कहीं-कहीं निजी फर्म भी उनकी रोजी-रोटी चला रही है। सौंसर के हाथकरघा से जुड़े बुनकर चंद्रशेखर का कहना है कि 18-20 साल से हाथकरघा से कपड़ा और साडिय़ां तैयार कर रहे हैं। इसकी मार्केटिंग निगम करता है। इसके अलावा हम निजी फर्म की जरूरतों को भी पूरा करते हैं। बुनकर की मजदूरी कम है। इस पर सोचने की आवश्यकता है।
टूरिज्म से जुड़े हैण्डलूम तो बढ़ेगी पारम्परिक कला
छिंदवाड़ा शहर में तैयार कपड़ों पर ब्लॉक प्रिटिंग से पारम्परिक कला को उकेरने का काम आशा (एड एंड सर्ववाइबल ऑफ हैण्डीक्रॉफ्ट आर्टीसंस) नाम की संस्था कर रही है। इस संस्था की प्रमुख आरती रोहित रुसिया का कहना है कि हैण्डलूम कपड़ों में कलाकारों द्वारा बनाए चित्रों के ब्लॉक से छपाई के काम के पुश्तैनी काम को आगे बढ़ा रहे हैं। यह पारम्परिक कला को जीवित रखने का प्रयास है। आरती बताती हैं कि वे इस काम में अब छिंदवाड़ा जिले की आदिवासी संस्कृति के चित्रों को ब्लॉक के माध्यम से प्रिंटिंग करने का नवाचार कर रही है। यह हैण्डलूम और हैण्डीक्राफ्ट अगर टूरिज्म से जुड़ जाए तो इस हस्तकला को बढ़ाया जा सकता है। उनके अनुसार वे इस कला से ग्रामीण महिलाओं को जोडकऱ नए कलाकार बना रही हैं।

हस्तशिल्प का सालाना टर्नओवर दस करोड़...
हस्तशिल्प विकास निगम के सहायक प्रबंधक सुधीर आजाद बताते हैं कि सौंसर, लोधीखेड़ा और मोहगांव के बुनकरों के उत्पाद कोसा टसर सिल्क, साड़ी, मलाबरी सिल्क, सलवार सूट, दुपट्टा और कपड़े को निगम देशभर में फैले अपने शोरूम से मार्केटिंग की सुविधाएं उपलब्ध करा रहा है। इस पूरे क्षेत्र का वार्षिक टर्नओवर 10 करोड़ रुपए है। इसमें 850 बुनकर परिवारों की मजदूरी से लेकर उनके उत्पाद की बिक्री तथा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े लोगों का पारिश्रमिक एवं लाभ शामिल है। आजाद का कहना है कि रेडीमेड और आधुनिक कपड़ों से मिल रही चुनौती के बीच हस्तशिल्प उत्पाद अपने कद्रदानों और शौकीनों की वजह से मार्केट में बने हुए हैं। हाई और मीडियम क्लास के लोगों की यह पसंद है।