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हिन्दी दिवस…छिंदवाड़ा में ऐसी है बोली, जिसे सीखने आई थी जर्मन विशेषज्ञ

मैंकोजी ने वर्ष 2004 में मवासी पर ब्रिज लेंग्वेज बनाने का किया था प्रयास

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छिंदवाड़ा. जमीन से 17 सौ फीट नीचे पातालकोट के 12 गांवों में भारिया गंूजती है तो बिछुआ के मड़कासुर और तामिया-जुन्नारदेव से लगे गांवों में बसे मवासी जनजाति की अपनी बोली मवासी सुनने को मिल जाएगी। सौंसर-पांढुर्ना में मराठी, कोयलांचल में बिहारी, मोहखेड़ में पवारी भाषा ऐसी है जिनका जिले की विविधता में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। हिन्दी दिवस 14 सितम्बर को जिले में अलग-अलग संस्कृतियों में प्रचलित इन भाषाओं और बोलियों को विशेष रूप से याद करना होगा। ये आम जुबां कहीं न कहीं हिन्दी के विकास में सहयोगी भूमिका निभा रही है। खास बात यह भी है कि मवासी भाषा की कठिनाई को समझने और उसमें हिन्दी के समानांतर शब्द ढृंढने जर्मन विशेषज्ञ भी छिंदवाड़ा आई थी।

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स्मार्टफोन के जमाने में नई पीढ़ी की हिंग्लिश
करीब 6 लाख जनसंख्या छिंदवाड़ा समेत 17 बड़े छोटे-नगरों में बसती है। स्मार्टफोन के इस जमाने में नई पीढ़ी हिन्दी-इंग्लिश के संयुक्त रूप हिंग्लिश को तेजी से स्वीकार कर रही है। उन्हें न पूर्णत: हिन्दी का ज्ञान है और ना ही इंग्लिश की समझ। इंग्लिश मीडियम स्कूल का चलन होने से शिक्षक भी हिंग्लिश में ही शिक्षा दे रहे हैं। व्यवसाय और रोजगार में भी इसका उपयोग हो रहा है। समाज में भी ये सर्वमान्य हो रही है।
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अलग-अलग बोलियों का संगम है छिंदवाड़ा
जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान के पूर्व व्याख्याता एवं वरिष्ठ शिक्षाविद् हेमंत चांद मवासी समेत अन्य बोलियों पर काम कर चुके हैं। उनके मुताबिक छिंदवाड़ा हिन्दी की सहयोगी कई बोलियां का संगम है। जिस क्षेत्र में निकल पड़ो,वहीं स्थानीय भाषा गूंजने लगती है। नागपुर रोड पर छिंदवाड़ा शहर के बरारीपुरा से लेकर सौंसर-पांढुर्ना के नगर व गांवों तक आपसी बोलचाल में मराठी लोकप्रिय है तो पांढुर्ना समेत कुछ इलाकों में गोंडी बोली जाती है। बिछुआ के मड़कासुर व तामिया-जुन्नारदेव के करियाढाना के आसपास मवासी है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2004 में जर्मन विशेषज्ञ लेडी मैंकेजी छिंदवाड़ा में मवासी और हिन्दी में ब्रिज लेंग्वेज तैयार करने आई थी। इस पर काम भी हुआ था। परासिया-जुन्नारदेव के कोयलांचल की खदानों के आसपास बिहारी और यूपी के मेल की भाषा है। मोहखेड़ में पवार समाज की बहुलता से पवार बोली जाती है। शिक्षाविद् का कहना है कि ये बोलियां छिंदवाड़ा की विविधता में योगदान दे रही है।
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गोंडी, भारिया के 8 सौ शब्दों को पहुंचाया भोपाल
आदिवासी संग्रहालय के पूर्व संचालक एवं वर्तमान में प्राचार्य राजेन्द्र सिंह ठाकुर वर्ष 2007 में गोंडी व भारिया भाषा पर रिसर्च पेपर तैयार कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि छिंदवाड़ा जिले से इन दो भाषाओं के करीब 800 शब्द खोजकर आदिवासी अनुसंधान केन्द्र भोपाल में पहुंचाए हैं। इन्हें शब्द कोष में शामिल किया गया है। ठाकुर बताते हैं कि आधुनिक युग में समाज में भाषा के उपयोग में काफी बदलाव आया है। फिर भी स्थानीय बोलियों और भाषाओं की अपनी भूमिका है। जिसे ग्रामीण अंचल के लोग आपसी बातचीत में सुरक्षित रखे हुए है।
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आपसी बोली कराती है आनंद का एहसास
पातालकोट, हर्रई, तामिया और जुन्नारदेव में रहनेवाले भारिया जनजाति की आबादी 52 हजार है। इस समाज से आने वाले पातालकोट के शिक्षक एमएल भारती बताते हैं कि भारिया परिवार जब आपस में मिलते हैं भारिया जिसे स्थानीय लोग भराठी भी कहते हैं, आपस में उपयोग करते हैं। ये स्थानीय बोली संबंधों की आत्मीयता का एहसास कराती है। स्कूलों और आश्रमों तक पहुंच हो जाने से लोग हिन्दी भी समझने, बोलने और पढऩे लगे हैं।