छिंदवाड़ा

जंगलों में बढ़ते खतरे, सुरक्षा और जागरूकता की जरूरत

वनवासी अंचलों में तेंदूपत्ता संग्रहण का कार्य जारी है, लेकिन जंगली जानवरों का बढ़ता खतरा चिंता का विषय बन गया है।

2 min read

मध्यप्रदेश के वनवासी और आदिवासी बहुल अंचलों में इन दिनों तेंदूपत्ता संग्रहण का कार्य जोर-शोर से जारी है। हर दिन हजारों ग्रामीण महिलाएं और बच्चे सुबह-सुबह जंगलों की ओर निकल जाते हैं। तेंदूपत्ता न केवल इन क्षेत्रों के लिए पारंपरिक आजीविका का साधन है, बल्कि इनकी वार्षिक आय का मुख्य स्रोत भी है। लेकिन इस जरूरी कार्य में अब खतरे का साया गहराने लगा है। पिछले कुछ दिनों में आधा दर्जन से अधिक लोगों की हिंसक जानवरों के हमलों में जान जा चुकी है। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि जंगलों में वन्यजीवों की बढ़ती गतिविधियों और सुरक्षा उपायों की कमी ने ग्रामीणों की जान जोखिम में डाल दी है।

तेंदूपत्ता संग्रहण में लगे लोग प्राय: बिना किसी प्रशिक्षण या सुरक्षा व्यवस्था के सीधे जंगल में प्रवेश करते हैं। वन विभाग द्वारा कुछ स्थानों पर निगरानी के लिए गश्ती दल तैनात किए गए हैं, लेकिन यह व्यवस्था सीमित क्षेत्र तक ही प्रभावी है। जमीनी सच्चाई यह है कि अधिकांश संग्राहक बिना किसी मार्गदर्शन के जंगलों में प्रवेश कर जाते हैं। कई बार वे अज्ञानतावश उन इलाकों में भी पहुंच जाते हैं, जो वन्यजीवों की आम आवाजाही के मार्ग होते हैं। ऐसे में किसी भी समय अप्रत्याशित घटनाएं हो सकती हंै, जिसका परिणाम जानलेवा हो सकता है। इस स्थिति से निपटने के लिए सबसे पहले आवश्यक है कि सरकार और वन विभाग की ओर से संग्राहकों को प्रशिक्षण दिया जाए।

तेंदूपत्ता संग्रहण शुरू होने से पहले प्रत्येक वन परिक्षेत्र में सुरक्षा और सतर्कता पर केंद्रित प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए जाने चाहिए। इन शिविरों में संग्राहकों को यह सिखाया जाए कि वन्यजीवों का सामना होने पर क्या करें और क्या न करें, किस प्रकार का शोर या सावधानी उन्हें हमले से बचा सकती है। प्रत्येक संग्राहक को सुरक्षा किट मुहैया कराना चाहिए। आज आवश्यकता है कि सरकार, वन विभाग और पंचायत स्तर की समितियां मिलकर इस दिशा में गंभीर पहल करें।

तेंदूपत्ता संग्रहण केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि हजारों ग्रामीण परिवारों की जीवनरेखा है। अगर उनके लिए यह कार्य जीवन को खतरे में डालने वाला बनता जा रहा है, तो यह शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी है कि इसे सुरक्षित बनाया जाए। जंगलों में बढ़ते खतरे को टालना संभव नहीं है, लेकिन उससे सावधानीपूर्वक निपटना अवश्य संभव है। इसके लिए प्रशासनिक इच्छाशक्ति, स्थानीय जागरूकता और समन्वित प्रयासों की जरूरत है।

Published on:
21 May 2025 06:54 pm
Also Read
View All

अगली खबर