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बस-टैक्सियों के पहिए थमे तो ड्राइवर-कंडक्टर के हाथ भी तंग

कोरोना लॉकडाउन से बिगड़ा घर का बजट, नहीं पहुंच पा रही सरकारी मदद

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बस-टैक्सियों के पहिए थमे तो ड्राइवर-कंडक्टर के हाथ भी तंग

बस-टैक्सियों के पहिए थमे तो ड्राइवर-कंडक्टर के हाथ भी तंग

छिंदवाड़ा / कोरोना लॉकडाउन में बस-टैक्सियों के पहिए थमने से ड्राइवर, कंडक्टर और मैकेनिक के हाथ तंग हो गए हैं। रोज की आय पर आश्रित इस वर्ग के घरों का बजट बिगड़ गया है। घरेलू सामग्री दाल, मसाले और तेल के लिए ये लोग मोहताज हैं। बेसब्री से लॉकडाउन खुलने का इंतजार कर रहे हैं। उन्हें पर्याप्त सरकारी मदद भी नहीं मिल पा रही है।
प्रतिदिन यात्रियों को शहरी और ग्रामीण इलाकों में ले जाने वाले लोग बताते हैं कि सामान्य दिन में ड्राइवर की आय प्रतिदिन 400-500 रुपए, कंडक्टर 300, क्लीनर 150 रुपए तथा मैकेनिक 200 रुपए औसत है। ये लोग प्रतिदिन बस-टैक्सियों में यात्री सवारी से मिलने वाले किराए पर निर्भर होते हैं। इससे ही इन परिवारों का गुजारा चलता है। बीती 24 मार्च से जब से कोरोना लॉकडाउन लागू हुआ है, यह वर्ग घर में कैद हो गया है और इनकी आय बंद हो गई है।
बस चालक दमुआ के नरेंद्र सूर्यवंशी बताते हैं कि लॉकडाउन से उनके जैसे परिवारों की आर्थिक स्थिति खस्ता हो गई है। राशन कार्ड पर गेहूं-चावल मिल गया है, लेकिन दाल, मसाले, तेल और सब्जियों के लिए पैसे नहीं है। उनका गुजारा तो हर दिन की आमदानी पर चलता था। लॉकडाउन के 18 दिन बीत जाने पर उनके हालात खराब हो चले हैं। ड्राइवर के साथ कंडक्टर, क्लीनर और मैकेनिक भी जुड़े हैं। इन परिवारों की हालत उनके घर पहुंचकर ही देखी जा सकती है। कुछ घरों में चूल्हा न जलने की नौबत है।
जुन्नारदेव के बस चालक मो. फारुक, सुनील मालवीय हो या अम्बाड़ा के राजेश नवाइत या फिर चांदामेटा के शहजाद खान, सब बताते हैं कि लॉकडाउन से जीवन के मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। हर घर की आर्थिक तंगी है। उनके जैसे परिवार प्रतिदिन की दिहाड़ी पर निर्भर हैं। सरकारी मदद न के बराबर है। इस वर्ग के लिए सरकार को कम से कम पांच हजार रुपए मासिक देना चाहिए। तभी उनके जैसे लोग अपने घरों का चूल्हा जला पाएंगे। ड्राइवर अजय यदुवंशी दातला, योगश पाल दमुआ, हुमुम प्रजापति दमुआ, आसिफ खान दातलावाड़ी ने भी कहा कि प्रशासन को उनके विषय में भी सोचना चाहिए। यहीं हालत जिला मुख्यालय में रहने वाले बस-टैक्सी ड्राइवर-कंडक्टर की है, वे अपनी बेबसी किसी से कह नहीं पा रहे हैं।