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जमीन से 1700 फीट नीचे निवास कर रहे लोगों से मिलेंगे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह

यहां देर से पहुंचती है सूर्य की रोशनी

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miracle villages in patalkot chhindwara

छिंदवाड़ा. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के मुख्य आतिथ्य और अनुसूचित जाति एवं जनजातीय कार्य विभाग के राज्य मंत्री लालसिंह आर्य की अध्यक्षता में जिले के पातालकोट क्षेत्र के ग्राम रातेड़ में छह अप्रैल को भारिया सम्मेलन का आयोजन किया गया है। सम्मेलन के दौरान मुख्यमंत्री जमीन से १७०० फीट नीचे निवास कर रहे लोगों से मुलाकात करेंगे। मुख्यमंत्री पातालकोट के रातेड़ में स्थानीय कार्यक्रम भारिया सम्मेलन में भाग लेने के बाद रात्रि विश्राम पातालकोट में ही करेंगे।

पातालकोट में आदिवासियों की एक अलग दुनिया
जिला मुख्यालय छिंदवाड़ा से 78 किमी दूर सतपुड़ा की पहाडि़यों के बीच जमीन के १७०० फीट नीचे बसा है पातालकोट। यह समुद्र तल से २७५०- ३२५० फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह स्थान ७९ वर्ग किमी में फैला हुआ है। पातालकोट आदिवासियों की एक अलग दुनिया वाले १२ गांवों का समूह। अपनी संस्कृति, इतिहास और भौगोलिक स्थिति से इसकी वैश्विक नक्शे में अलग पहचान है तो वहीं दिन में भी रात का एहसास कराने वाला यह क्षेत्र जगप्रसिद्ध है। पातालकोट की सबसे खास बात यह है कि जमीन से नीचे होने और सतपुड़ा की पहाडि़यों से घिरा होने से इसके काफी हिस्से में सूरज की रोशनी देर से पहुंचती है, वह भी इतनी कम कि दिन में भी रात नजर आती है।

घोड़े की नाल जैसा आकार
प्राकृतिक दृश्यावली के कारण यह बहुत मनमोहक है। पाताल से अर्थ इसका एक गहराई में बसा होना है। इसके मुहाने पर ऊपर बैठ कर जब नीचे झांका जाता है, तो इसका आकार एक घोड़े की नाल जैसा नजर आता है। ऐसी जनश्रुति है कि यह पाताल लोक जाने का दरवाजा है। एक समय यहां के आदिवासी बाहरी दुनिया से दूर थे, लेकिन अब सरकारी प्रयासों से वे समाज की मुख्य धारा में शामिल हो गए हैं।

पाताललोक में गया था मेघनाथ
पौराणिक मान्यता हैं कि इस स्थान से रामायण के पात्र रावण का पुत्र मेघनाथ, भगवान शिव की आराधना कर पाताललोक में गया था। यह इलाका जड़ी-बूटियों के लिए भी जाना जाता है। पातालकोट के १२ गांव गैलडुब्बा, कारेआम, रातेड़, घटलिंगा-गुढ़ीछत्री, घाना कोडिय़ा, चिमटीपुर, जड़-मांदल, घर्राकछार, खमारपुर, शेरपंचगेल, सुखाभंड-हरमुहुभंजलाम और मालती-डोमिनी है, जहां एक समय जाना मुश्किल था। अब इसे पक्की सडक़ से जोड़ दिया गया है। यहां की आबादी भारिया और गौंड आदिवासी समुदाय की हैं, जो अभी भी काफी हद तक प्राकृतिक व्यवस्थाओं पर आश्रित हैं।

500 वर्षों से निवास कर रहे आदिवासी
कहा जाता है कि इस जनजाति के लोग इस स्थान पर पिछले ५०० वर्षों से निवास कर रहे है। यह स्थान प्राकृतिक रूप से एक गहरी गर्त का किला-सा बन गया है। इसकी तलहटी से आसपास की पर्वत श्रेणियां करीब १२०० फीट ऊंची हैं। इसके पाास से ही दूधी नदी बहती है। वर्तमान में नीचे जाने के मार्ग बना दिए गए हैं। इसके पूर्व यहां लोग लताओं, बेलाओं तथा पेड़ पौधों को पकड़ कर नीचे और ऊपर आया जाया करते थे। यह स्थान अपनी अमूल्य जड़ी- बूटियों के लिए विख्यात है। यहां रहने वाले आदिवासी इन्ही जड़ी बूटियों से अपने कष्टों का निवारण करते हैं। वर्तमान में शासन द्वारा इन्हे सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।