
मध्य को भारत का हृदय प्रदेश कहा जाता है, जो अपनी घनी वनों से आच्छादित प्राकृतिक संपदा और जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध है। किंतु हाल के वर्षों में विकास के नाम पर पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंची है। बीते पांच वर्षों में तीन लाख से अधिक वृक्षों की बलि चढ़ा दी गई है, जिससे प्रदेश की पारिस्थितिकी गंभीर संकट का सामना कर रही है।
बेलगाम वनों की कटाई ने न केवल वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को विनष्ट किया है, बल्कि जलवायु परिवर्तन, मिट्टी के क्षरण, वायु प्रदूषण और जैव विविधता के क्षरण को भी बढ़ाया है। विकास परियोजनाओं के लिए वनों की बलि देना अनिवार्य सा प्रतीत हो रहा है। हालांकि, कानूनन क्षतिपूर्ति पौधरोपण का प्रावधान किया गया है, परंतु जमीनी हकीकत इससे कोसों दूर है। पौधरोपण की गति वृक्षों की कटाई की तुलना में नगण्य है, जिससे प्राकृतिक संतुलन प्रभावित हो रहा है।
आधुनिकीकरण, नगरीकरण और बुनियादी ढांचे के विस्तार के नाम पर वनों को लगातार नष्ट किया जा रहा है। सडक़ निर्माण, औद्योगीकरण, शहरी विस्तार और खनन गतिविधियों के लिए हजारों हेक्टेयर वन भूमि साफ कर दी गई है। प्रदेश में कोयला खनन, स्टील एवं सीमेंट उद्योगों के विस्तार ने वनों के विनाश की गति को और अधिक तीव्र कर दिया है। पेड़ संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र का आधार हैं।
वृक्षों की जड़ें मिट्टी को बांधकर रखने में सहायक होती हैं, जिससे भूमि क्षरण और बाढ़ की आशंका कम रहती है, लेकिन जब वृक्षों को काट दिया जाता है, तो यह संतुलन भंग हो जाता है। प्रदेश के जंगलों में बाघ, तेंदुआ, भालू, हिरण, गौर, सरीसृप और पक्षियों की कई दुर्लभ प्रजातियां निवास करती हैं, लेकिन वनों की कटाई से इनके प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैंं। विकास के नाम पर जिस तरह से वृक्षों की कटाई की जा रही है, वह गंभीर चिंता का विषय है।
वन हमारी पृथ्वी के फेफड़े हैं और यदि इनका विनाश इसी गति से जारी रहा, तो आने वाले समय में हमें गंभीर पर्यावरणीय संकट का सामना करना पड़ेगा। विकास और पर्यावरण में संतुलन बनाए रखना अनिवार्य है। सरकार, उद्योग और आम नागरिकों को एकजुट होकर हरित संपदा के संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। अन्यथा भविष्य की पीढिय़ों को एक ऐसी दुनिया विरासत में मिलेगी, जहां शुद्ध वायु, जल और हरियाली केवल इतिहास के पन्नों में सिमटकर रह जाएगी।
Published on:
07 Mar 2025 06:42 pm
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