
City corporation chhindwara
मंतोष कुमार सिंह
शहर सरकार का संचालन तभी बेहतर हो सकता है जब पक्ष और विपक्ष एक साथ बैठें। कामकाज पर चर्चा और व्यवस्था की समीक्षा हो। इसलिए सत्र के नियम बने हुए हैं। लोकसभा व विधानसभा में न्यूनतम बैठकों के दिन निर्धारित किए गए हैं, लेकिन शहर की सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया है। न तो बैठकों के दिन निर्धारित हैं और न ही सत्र की व्यवस्था है। हाल यह है कि नगर निगम परिषद की बैठक सात माह से आयोजित नहीं की गई है। ऐसे में शहर के विकास का सपना कैसे सच हो सकता है।
निगम में जनता के साथ निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की आवाज भी दबाई जा रही है। पार्षदों तक को बोलने का मौका नहीं दिया जा रहा है। इससे बड़ी बिडम्बना और क्या हो सकती है कि वार्डों की समस्याओं के निदान के लिए पार्षदों को निगम आयुक्त से गुहार लगानी पड़ रही है। जनसुनवाई में आवेदन देना पड़ा रहा है। ऐसे में जिम्मेदारों का यह तर्क कि निगम के पास बैठक के लिए एजेंडा नहीं है, हास्यास्पद और समझ से परे है। पेयजल, आवारा मवेशी, अतिक्रमण, नाली, स्ट्रीट लाइट जैसे मुद्दे समाधान की राह देख रहे हैं।
निगम में शामिल २७ गांवों के निवासियों को अब तक शहरी कहलाने का हक नहीं दिया गया है। इन गांवों को शहर के वार्ड तो बना दिए गए, लेकिन मुलभूत सुविधाएं भी मुहैया नहीं कराई गईं। सीवरेज योजना, जल प्रदाय योजना, रेलवे ओवरब्रिज, मटन मार्केट जैसी निगम से जुड़ी शहर की कई समस्याएं मुंह चिढ़ा रहीं हैं। दिसम्बर में होने वाले खेल महोत्सव पर भी चर्चा की दरकार है। पिछले आयोजनों पर गम्भीर आरोप लगते रहे हैं। परिषद की बैठक आयोजित कर इन समस्याओं का समाधान खोजा जाए।
नगर निगम की छोटी सी पहल से बड़ा बदलाव आ सकता है। संसद और विधानसभा की तर्ज पर निगम में सत्र व्यवस्था शुरू की जाए। पक्ष और विपक्ष के पार्षद शहर की समस्याओं पर चर्चा करें, समाधान के रास्ते सुझाएं और अधिकारी उन सार्थक बहस पर क्रियान्वयन करें। भाजपा शासित नगर निगम सरकार ऐसा कर देश के निकायों में नजीर पेश कर सकती है।
Published on:
26 Oct 2017 01:07 am
बड़ी खबरें
View Allछिंदवाड़ा
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
