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माता-पिता दोनों का फर्ज निभा रहीं दृष्टिहीन संगीता

वल्र्ड पेरेंट्स-डे पर विशेष

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माता-पिता दोनों का फर्ज निभा रहीं दृष्टिहीन संगीता

छिंदवाड़ा. बच्चों के लिए माता-पिता सब कुछ होते हैं। बच्चों के जन्म से लेकर उनका कॅरियर बनाने तक हर समय उनके साथ खड़ा रहते हैं। हल्का सा दर्द होने पर भी पेरेंट्स की आह निकल उठती है। वल्र्ड पेरेंट्स-डे पर समाज को प्रेरणा देने वाली एक मां की कहानी बता रहे हैं। एक ऐसी मां जिसके सामने हमेशा अंधेरा रहता है, जो दुनिया नहीं देख सकती, सिर्फ सुन सकती है, स्पर्श कर सकती है, लेकिन उसने कभी भी दृष्टिहीन होने का अहसास बच्चों को नहीं होने दिया। हम बात कर रहे हैं शिक्षिका संगीता डेहरिया की। शहर की संगीता डेहरिया शासकीय माध्यमिक शाला सलैया में अध्यापक हैं।

तो आंखों की चली गई रोशनी
संगीता जब तीन साल की थीं तो उनके आंखों की रोशनी चली गई। उसके बाद कभी भी उन्होंने आंखों से दुनिया को नहीं देखा। 2010 में संगीता की शादी हुई, लेकिन शादी का बंधन ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाया और पति ने उनका साथ छोड़ दिया। विपरित परिस्थतियों के बावजूद संगीता ने हौसला नहीं खोया। माता-पिता दोनों का फर्ज निभाया। बच्चों की परवरिश में कोई कमी नहीं होन दी। संगीता की बेटी वैष्णवी मेहरा कक्षा चौथी में शहर के एक निजी स्कूल में पढ़ती है तथा बेटा निर्देश मेहरा दूसरी कक्षा का छात्र है। बेटी की उम्र साढ़े आठ साल और बेटा सात साल का है।

सभी जिम्मेदारियां मां के कंधों पर
संगीता बच्चों की सभी जिम्मेदारियां स्वयं उठाती हैं। सुबह पांच बजे उठने के साथ संगीता दिनचर्या में लग जाती हैं। सबसे पहले बच्चों के लिए टिफिन तैयार करती हैं। बच्चों को तैयार कर स्कूल भेजती हैं। फिर स्वयं तैयार होकर नौ बजे स्कूल के लिए निकल जाती हैं। शाम को स्कूल से आने के बाद बच्चों को घूमाने ले जाना, फिर होमवर्क कराना। बेटा और बेटी को कभी भी संगीता के दृष्टिहीन होने का अहसास नहीं हुआ। बच्चों के सभी इच्छाएं मां पूरी कर रही हैं। बेटी वैष्णवी का कहना है कि मैं पढ़ लिख कर जिला अधिकारी बनूंगी ताकि सभी लोगों को उनका अधिकार दिला सकूं। वही बेटा निर्देश का कहना है कि मैं जज बनकर न्याय व्यवस्था में सुधार करूंगा, अन्याय के खिलाफ आवाज उठाकर लोगों को न्याय दिलाऊंगा।