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पेसा एक्ट…आदिवासियों की स्थानीय बोली बनेगी बाधा, करना होगा ये काम

आदिवासी आबादी में पलायन भी बड़ी समस्या, विशेष अधिकार के लिए बनानी पड़ेगी संवाद की रणनीति

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छिंदवाड़ा.राज्य शासन ने आदिवासियों के विशेष अधिकार वाले पेसा एक्ट के प्रावधान जिले के 4 आदिवासी विकासखंडों की 270 ग्राम पंचायतों के 1848 ग्रामों में जरूर लागू कर दिए हैं लेकिन इस नियम को जन-जन तक पहुंचाने में भारिया, मवासी और गोंडी बोली बाधा बनेगी। ऐसे इलाकों में संवाद के लिए प्रशासन को विशेष रणनीति बनानी होगी, तभी लोग अपने अधिकार जान पाएंगे।
देखा जाए तो जिले की करीब 23 लाख जनसंख्या में आदिवासियों की भागीदारी 37 फीसदी है। इनमें मुख्य रूप से गोंड, भारिया, मवासी जनजाति है। यह तामिया, जुन्नारदेव, बिछुआ, अमरवाड़ा, परासिया और पांढुर्ना समेत अन्य इलाकों में बसती है। गोंड जनजाति की संख्या सर्वाधिक है। ये लोग आपसी संवाद में गोंडी भाषा का उपयोग करते हैं। मवासी जनजाति बिछुआ और जुन्नारदेव के आसपास है, जिसकी भाषा दूसरे लोग समझ नहीं पाते। भारिया पातालकोट, हर्रई और तामिया में बसते हैं, जिनकी बोली भरिया है। इन तीनों अलग-अलग भाषा में पेसा एक्ट के प्रावधान कैसे लागू होंगे? यह सवाल बना हुआ है। हालांकि मुख्यमंत्री ने एक दिन पहले भोपाल में आदिवासियों को उनकी सरल भाषा में एक्ट के प्रावधान बताने की बात कहीं हैं। इसके दृष्टिगत प्रशासन को पहले आपसी संवाद का भाषा जानकार खोजना होगा। तभी आदिवासियों को विशेष अधिकार समझाने के प्रयास करने होंगे।
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सामाजिक नेताओं और शिक्षकों की जरूरत
भारतीय गोंडवाना पार्टी के जिलाध्यक्ष झमक सरेयाम का कहना है कि पेसा एक्ट के प्रावधान आदिवासी इलाकों में समझाने के लिए प्रशासन को सामाजिक नेताओं, सरपंच और शिक्षकों को साथ लेकर काम करना होगा। तभी उन्हें वास्तविक अधिकार का एहसास होगा। भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा के जिला प्रभारी कमलेश उइके ने कहा कि चिन्हित गांव में चौपाल लगाकर पेसा एक्ट की जानकारी देने का अभियान शुरू कर दिया है। इससे आदिवासी अपने अधिकार जान सकेंगे।
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पेसा एक्ट लागू करने में ये भी चुनौतियां
1.आदिवासी इलाकों में लोग रोजी-रोटी के सिलसिले में साल के 6 माह बाहर पलायन करते हैं। मौसमी फसल काटने के साथ निर्माण कार्य की मजदूरी करने केरल, दिल्ली, हैदराबाद, यूपी तक जाते हैं।
2.आदिवासी इलाकों में सड़क, पानी, बिजली, पुल-पुलिया जैसी मूलभूत समस्याएं है, जिनके निराकरण पर कभी ध्यान नहीं दिया गया है। इसके चलते कलेक्ट्रेट में हर मंगलवार जनसुनवाई में दिखाई देते हैं।
3.तामिया, हर्रई, जुन्नारदेव और अमरवाड़ा में चिरौंजी, महुआ जैसी लघु वनोपज आय का जरिया है। जहां बिचौलिए को बेचने से वे आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हो पाए हैं।
4.आदिवासी क्षेत्र में अवैध शराब, आपसी झगड़े, टोना टोटका जैसी सामाजिक कुरीतियां हावी है।
5.पेसा एक्ट के प्रावधान को आदिवासियों को उनकी भाषा में समझाने और निरंतर जनजागरुकता अभियान चलाने की जरूरत है।
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