
RAMLILA : Angad-Ravan dialogue
छिंदवाड़ा/ छोटी बाजार में चल रही रामलीला के ग्यारहवें दिन विभीषण शरणागति और अंगद-रावण संवाद के महत्वपूर्ण प्रसंग मंचित किए गए। रावण को भरे दरबार में राम के गुप्तचर के आने और लंका पर चढ़ाई की सूचना मिलती है। इस मौके पर विभीषण भी वहां उपस्थित रहते हैं। वे रावण का समझाते हैं कि वे गलत कर रहे हैं। राम साक्षात नारायण का रूप है और उन पर विजय नहीं पाई जा सकती। अच्छा यही होगा कि सीता को राम के पास वापस ससम्मान भेज दिया जाए।
रावण इसे अपना अपमान समझता है और विभीषण को कुलद्रोही कहकर उसे भरी सभा में लात मारकर लंका से निकल जाने कहता है। विभीषण अपने सहयोगियों से मंत्रणा करने के बाद भगवान राम की शरण में जाते हैं। राम उनसे चर्चा करते हैं और विभीषण को लंका के राजा के रूप में राज्याभिषेक करते हैं। इधर, समुद्र पार कर सेना के लंका तक पहुंचने के लिए समुद्र पर पुल बनाने का निश्चय किया जाता है। समुद्र पर पुल बनाने के बाद पहले अंगद को संधि करने के लिए लंका भेजना तय किया जाता है।
अंगद-रावण की सभा में पहुंचते हैं। रावण राज सिंहासन पर ऊंचे स्थान पर बैठा रहता है। अंगद अपनी पूंछ से उसके बराबर की बैठक बनाते हैं और फिर बात कहते हैं। अंगद रावण के बीच काफी देर संवाद होता है। अंगद रावण के अहंकार को तर्क से चूर-चूर कर देता है। इसके बावजूद वह संधि करने से मना करता है तो अंगद सभा में अपना एक पांव जमा देते हैं और कहते हैं कि इसे यदि कोई हिला दे तो राम बिना युद्ध किए वापस चले जाएंगे। रावण के बड़े योद्धा कोशिश करते हैं, लेकिन सफल नहीं होते। आखिर में रावण खुद उनके पैर पकडऩा चाहता है तो अंगद अपने पांव हटा लेते हैं और कहते हैं कि मेरे पैर पकडऩे से अच्छा है श्रीराम के पैर पकड़ो तो कल्याण होगा। अंगल युद्ध का ऐलान कर वापस आ जाते हैं।
Published on:
06 Oct 2019 07:44 pm
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