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भारिया जनजाति की हकीकत: आज भी खेती के लिए बैल की जगह जुत रहीं आदिवासी महिलाएं

प्रशासन नहीं दिला पा रहा पातालकोट के आदिवासियों को योजनाओं का लाभ, अधिकारी और नेता नहीं लेते सुध

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Reality of Bharia tribe

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छिंदवाड़ा/छिंदी. बीते माह पातालकोट में मुख्यमंत्री ने रात्रि चौपाल लगाई। आदिवासियों को हर सम्भव मदद देने और पातालकोट की भारिया जनजाति के लोगों को योजनाओं का विशेष लाभ दिलाने का वादा कर चले गए, लेकिन इसके बाद भी पातालकोट के आदिवासियों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया। आदिवासियों के लिए योजनाएं सिर्फ कागजों पर ही बन रहीं तथा कागजों पर ही उनका लाभ मिल रहा है।
पातालकोट के आदिवासियों का मुख्य व्यवसाय खेती है। शासन खेती को फायदे का सौदा बनाने का वादा करता है, लेकिन इन आदिवासियों को तो इनके लिए बनाए गए भारिया विकास प्राधिकरण की योजनाओं का लाभ भी नहीं मिल पा रहा है। बीते तीन वर्षों से आदिवासी शासकीय योजना में मिलने वाले बछड़ों के लिए चक्कर लगाकर थक गए हैं। हालात ऐसे हैं कि खेती के भरोसे बैठे आदिवासियों के पास खेतों में जुताई और अन्य कार्यों के लिए बैल जोड़ी तक नहीं है। आखिरकार इन आदिवासियों को खुद बैल बनकर खेती में जुटना पड़ रहा है। ऐसे हालात वर्तमान में पूरे पातालकोट और तामिया ब्लॉक में हैं। मुख्यमंत्री की भारिया आदिवासियों और तामिया ब्लॉक के ग्रामीणों को हर सम्भव शासकीय योजनाओं का लाभ दिलाने के आदेश की हवा निकलती दिखाई पड़ रही है।

पूरे पातालकोट की यही स्थिति
वर्तमान में पातालकोट के ग्रामीण मक्के की बोवनी में लगे हुए हैं। पिछले कई वर्षों से बजट न होने का हवाला इन आदिवासियों को दिया जाता है। पुरुषों व महिलाओं द्वारा बैल बनकर खेती के काम में जुटने वाले नजारे पूरे पातालकोट और तामिया ब्लॉक में देखने को मिलेंगे। पातालकोट के इन 12 गांवों की आबादी तकरीबन तीन हजार की करीब है। इन आदिवासियों को शासकीय योजना के तहत बैल बछड़े दिए जाने थे जो नहीं दिए गए। वर्तमान में रातेड़, चिमटीपुर, गुज्जा डोंगरी, हर्रा कछार, सूखाभांड, घटलिंगा, गैलडुब्बा, करियाम रातेड़, सिधोली में एेसी ही स्थिति नजर आ रही है।

तीन वर्षों से नहीं मिला बजट
भारिया आदिवासियों के लिए भारिया अभिकरण से बजट आता है जो कि तीन वर्षों से नहीं मिल पाया है। इसके कारण उन्हें अनुदान नहीं मिल पाया है।
शिल्पा जैन, सहायक आयुक्त जनजाति कार्य विभाग