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‘तत्वाभ्यास के संस्कार परभव में भी कार्यकारी’स्वाध्याय भवन में चल रहे प्रवचन

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chhindwara jain society

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छिंदवाड़ा/ स्वाध्याय मनुष्य के लिए सर्व प्रकार से करने योग्य है, क्योंकि इस भव में किए गए ईमानदारी पूर्वक तत्व अभ्यास के बल से जन्मे संस्कारों के परिणाम स्वरूप यह जीव अगले भव में कदाचित त्रियंचादि गतियों में भी हो तब भी सम्यकत्व प्राप्त कर सकता है। यह मार्मिक उदगार स्वाध्याय भवन में चल रहे मंगल प्रवचनों में प्रसार भारती भोपाल से आए युवा विद्वान पंडित अंकुर शास्त्री ने व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि लौकिक प्रयोजन या मान प्रतिष्ठा के अर्थ यदि अभ्यास करें तो वह शास्त्र ज्ञान इस भव में भी कार्यकारी सिद्ध नहीं होता। अत: हमें अपनी शक्ति छुपाए बगैर नियमित जिनवाणी के स्वाध्याय में प्रवृत्त होना चाहिए।
वास्तव में जिनवाणी के अभ्यास से पैदा हुई संवेदन शक्ति रूप संपदा हमारी इस भव की सच्ची पूंजी है। संवेदना में सर्वगुण समाहित है एक संवेदनशील व्यक्ति का चरणानुयोग भी सहज ही पलता है वह हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह, ईष्र्या, वैमनस्य में कदापि संलग्न नहीं रह सकता। यह संवेदना के संस्कार हमें जिनवाणी के नियमित अभ्यास से ही मिलते हैं। जैन आचार्यों ने जिस कठिन परिश्रम से हम तक यह तत्वज्ञान पहुंचाया है क्या हम उस तत्वज्ञान को उतना श्रम कर प्राप्त करने के लिए उद्द्यत हुए हैं, इस बात का विचार करना होगा। सच्चे देव, गुरु, शास्त्र सर्वोत्कृष्ट पदार्थ हैं। इनका सर्व प्रकार से सदुपयोग करके हमें हमारा मुक्तिमार्ग प्रशस्त करना चाहिए। इस संसार, शरीर और भोगों से अपनी रुचि हटाकर अपने निज शुद्धातम तत्व में ही दृष्टि को एकाग्र करना यही नरभव की सार्थकता है, क्योंकि हमें प्राप्त हुए इस एक भव में हमें जन्म मरण रूप अनंत भवों का अभाव करना है। अत: जन्म जरा मरण के अभाव के लिए और परम मुक्त अवस्था की प्राप्ति के लिए जिनवाणी के अभ्यास में निरंतर संलग्न रहना ही परम उपादेय है।

बह रही आध्यात्म की गंगा

जैन युवा फेडरेशन के सचिव दीपकराज जैन ने बताया कि श्री आदिनाथ जिनालय के 26वें वार्षिक महोत्सव में शास्त्रीजी का आना महान पुण्योदय को दर्शाता है। जिनके मंगल प्रवचनों में आध्यात्म की गंगा बह रही है। किसी भी आयोजन की सार्थकता जिनवाणी श्रवण से है और यह अवसर मिला अंकुर शास्त्री के श्रीमुख से जिसके लिए मुमुक्षु मंडल एवं जैन युवा फेडरेशन उनका आभारी है।