
ग्रामीण इलाकों में श्रम आधारित मनरेगा योजना में इस समय मजदूरी है 261 रुपए और इससे श्रमायुक्त मप्र की ओर से अकुशल श्रमिकों के लिए घोषित मजदूरी 466 रुपए प्रतिदिन। इनमें से कौन मजदूर इस दूसरे विकल्प में नहीं जाना चाहेगा। दरअसल सरकारी स्तर ही मजदूरी के इस अलग-अलग मापदण्ड से मजदूर व्यथित है। वह शहर के 25 किमी दूर के गांवों में घरेलू मजदूरी छोड़ शहर आना ज्यादा पसंद कर रहा है। इस कहानी में हर किसी के अपने-अपने कारण है लेकिन ज्यादातर महंगाई में जीवन की जरूरतें पूरी करना हर मजदूर का सपना है। एक मई को मई दिवस के मौके पर केन्द्र और राज्य सरकार को जरूर मजदूरों की इस पीड़ा पर सोचना होगा।
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देखा जाए तो 23.76 लाख आबादी वाले छिंदवाड़ा और पांढुर्ना जिले में 37 फीसदी आदिवासी है। इनमें से ज्यादातर मजदूर वर्ग के है। शेष वर्ग में अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग के लोग है। ये भी मजदूरी करने जाते हैं। हर दिन 2 से 3 हजार मजदूर हर दिन आसपास के गांव सारना अजनिया, उभेगांव समेत रिंग रोड के गांवों से मजदूरी करने छिंदवाड़ा पहुंचते हैं। इससे जिला मुख्यालय से लगी पंचायतों में भी कई बार मनरेगा के मजदूर मुश्किल हो रहे हैं। कारण उनके पास छिंदवाड़ा आना आसान है। फिर कम मजदूरी में काम करना गंवारा नहीं।
आदिवासियों का पलायन रोकने सरकार ने वर्ष 2005 में मनरेगा योजना लागू की थी। इसका मकसद मजदूरों को 100 दिन का रोजगार स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कराना था। तब से अब तक मनरेगा में कई तरह के बदलाव देखने को मिले हैं। वर्तमान में मजदूरी दर 261 रुपए रखी गई है। मजदूर वर्ग इसे महंगाई के अनुरूप नहीं मान रहा है। हर मजदूर की ख्वाहिश कम से कम 500 रुपए प्रतिदिन की मजदूरी है।
कलेक्टर ने श्रमायुक्त इन्दौर की अधिसूचना के परिप्रेक्ष्य में जिले में कार्यरत मजदूरों और दैनिक वेतन भोगी श्रमिकों के लिए मजदूरी व वेतन घोषित किए। इन्हें 1 अप्रैल से 30 सितंबर तक प्रभावशील किया। इनमें अकुशल श्रमिकों के लिए 466 रुपए प्रतिदिन की मजदूरी या वेतन देय होगा। ये सभी मजदूर अकुशल श्रेणी के ही आते हैं। जिनका एक ओर राज्य सरकार का श्रम विभाग समर्थन कर रहा है। मनरेगा और इस मजदूरी तब अलग-अलग है, जब मजदूरों का काम एक सा है।
ज्यादातर भवन निर्माण में महिलाएं काम करने आ रही है। उनके गांवों की दूरी 30 से 50 किमी होती है। अमरवाड़ा के ग्राम सोनपुर से आनेवाली महिला मजदूर रामकली बताती है कि महंगाई सभी जगह एक समान है। घरेलू खर्च चलाने मनरेगा की मजदूरी कम है। शहर में ज्यादा पैसे वाले काम मिल जाते हैं। यहीं कहानी दूसरी महिलाओं की भी है।
पंचायतों में इस समय खेत तालाब, वाटर रिचार्जिंग जैसे जल संवर्धन कार्य हो रहे है। आसपास की पंचायतों रामगढ़ी, सारना, खैरीभुताई, मेघासिवनी समेत अन्य में देखा जाए तो मजदूर कम ही मिलेंगे। वजह है मनरेगा की कम मजदूरी। इससे ज्यादा तो उन्हें 10 किमी दूर छिंदवाड़ा में ज्यादा मजदूरी मिल रही है।
टॉपिक एक्सपर्ट समाजसेवी आरएस कुशवाह का कहना है कि मनरेगा में मजदूरी कम होने का मुद्दा स्थानीय सांसद व जनप्रतिनिधियों को केन्द्र सरकार के समक्ष उठाना चाहिए। उनकी मजदूरी महंगाई के अनुरूप हो तो उन्हें इसका लाभ मिलेगा। उनका पलायन रुकेगा।
Published on:
01 May 2025 11:40 am
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