
एमपी में मोबाइल एप करेगा गिद्धों की गिनती (Photo Source- Patrika)
गिद्धों की संख्या तामिया, हर्रई और छिंदी की ऊंची पहाडिय़ों के आसपास ही सिमटकर रह गई है। जिले के दूसरे इलाकों में इसका विस्तार नहीं हो पाया है। यहां तक कि पांढुर्ना वनमण्डल में भी इसकी कोई संख्या नजर नहीं आई है। वन अधिकारी मान रहे हैं कि ये पक्षी प्रजाति पशु चिकित्सा में उपयोग दवा डाइक्लोफेनाक का शिकार हो रही है। इससे इनकी संख्या नहीं बढ़ पा रही है।
हाल ही गिद्ध गणना में जिले का डाटा सामने आया। उसमें पश्चिम वनमण्डल के तामिया और श्रीझोत में 53 गिद्ध पाए तो वहीं अमरवाड़ा, पूर्व हर्रई, पश्चिम हर्रई और पूर्व बटकाखापा और पश्चिम बटकाखापा में 102 गिद्धों की संख्या देखी गई है। इसके अलावा पांढुर्ना वनमण्डल में इसकी संख्या नहीं पाई गई है। इनका आवास देखा जाए तो गिद्ध का घोसला हमेशा ऊंची पहाडिय़ों की कंदराओं में पाया जाता है। भोजन ये हमेशा मरे जानवरों का मांस करते रहे हैं।
वन अधिकारी बताते हैं कि इस समय रासायनिक दवाओं का छिडक़ाव खेतों में हो रहा है। जानवरों इसे खाते हैं। उनकी मौत होने पर गिद्ध इसे खाते हैं तो इस स्थिति में उनके गुर्दे खराब हो जाते हैं। रिटायर्ड सहायक वन संरक्षक आरएस कुशवाहा बताते है कि गिद्धों की संख्या पिछले तीन दशक से कम हो रही है। दूरदराज के क्षेत्र तामिया, अमरवाड़ा,छिंदी, हर्रई, बटकाखापा के सुदूर अंचल में इनका निवास है। शहरी क्षेत्र में ये पक्षी प्रजाति दिखाई नहीं दे रही है। इसका कारण भोजन, रहवास की समस्या है। जिसकी अनदेखी की जा रही है।
Published on:
26 Feb 2026 11:54 am
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