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क्या आप जानते हैं क्यों होता है तुलसी और शालीग्राम का विवाह, पढ़ें यह खबर

देवउठनी ग्यारस आज : चार महीने के बाद शुरू होंगे मांगलिक कार्य

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Tulsi Vivah

Tulsi Vivah 2018: देवोत्थान एकादशी के दिन है तुलसी विवाह, ये शुभ मुहूर्त और विवाह की विधि

छिंदवाड़ा. सोमवार को देवउठनी ग्यारस पर घर-घर शालिग्राम और तुलसी के विवाह के साथ चार महीने के बाद मांगलिक कार्यक्रमों की फिर से शुरुआत होगी। कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा भी की जाती है। हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु चार महीने की गहरी नींद के बाद जागते हैं। उनके उठने के साथ ही हिन्दू धर्म में शुभ और मांगलिक कार्यक्रमों की फिर से शुरुआत होती है। लोग अपने घरों में गन्ने का मंडप बनाते हैं उसके नीचे भगवान विष्णु की प्रतिमा और तुलसी का पौधा लगाया जाता है। पूजा-अर्चना के बाद दोनों का विवाह संपन्न कराया जाता है। आतिशबाजी के साथ इस बड़ी एकादशी को उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
मौसमी फल और सब्जियां भी अर्पित करते हैं भगवान को: ध्यान रहे चतुर्मास व्रत का समापन भी इसी दिन होता है। चार महीने तक व्रतवासी सादगी भरा भोजन करने के साथ कई सब्जियों का सेवन भी बंद कर देते हैं। देवउठनी एकादशी के दिन देर शाम पूजा के समय इन सब्जियों को भी भगवान के सामने रखा जाता है। इसके साथ ऋतु फल यानि बेर, आंवला आदि भी अर्पित किया जाता है। इसी मौसम में गन्ना भी आता है अत: इसी का मंडप बनाया जाता है और उसके नीचे पूजा की जाती है।

इसलिए होता है तुलसी और शालीग्राम का विवाह

जलंधर नाम का एक बलशाली असुर था। उसका विवाह वृंदा नामकी कन्या से हुआ था। वह विष्णु की भक्त थी। जलंधर अपनी पत्नी की भक्ति और पतिव्रत के कारण अजेय हो गया था। वह स्वर्ग की कन्याओं को परेशान करने लगा। दुखी होकर देवता भगवान विष्णु की शरण में गए। भगवान विष्णु ने अपनी माया से जलंधर का रूप धारण कर लिया और छल से वृंदा के पतिव्रत धर्म को नष्ट कर दिया। इससे जलंधर की शक्ति क्षीण हो गई और वह युद्ध में मारा गया। जब वृंदा को भगवान विष्णु के छल का पता चला तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर का बन जाने का शाप दे दिया। देवताओं की प्रार्थना पर वृंदा ने अपना शाप वापस ले लिया, लेकिन भगवान विष्णु वृंदा के साथ हुए छल के कारण लज्जित थे। अत: वृंदा के शाप को जीवित रखने के लिए उन्होंने अपना एक रूप पत्थर रूप में प्रकट किया जो शालिग्राम कहलाया। भगवान विष्णु को दिया श्राप वापस लेने के बाद वृंदा जलंधर के साथ सती हो गई। भगवान विष्णु ने वृंदा से कहा कि तुम अगले जन्म में तुलसी के रूप में प्रकट होगी और लक्ष्मी से भी अधिक मेरी प्रिय रहोगी। तुम्हारा स्थान मेरे शीश पर होगा। मैं तुम्हारे बिना भोजन ग्रहण नहीं करूंगा। यही कारण है कि भगवान विष्णु के प्रसाद में तुलसी अवश्य रखा जाता है। बिना तुलसी के अर्पित किया गया प्रसाद भगवान विष्णु स्वीकार नहीं करते हैं। वृंदा की मर्यादा और पवित्रता को बनाए रखने के लिए देवताओं ने भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप का विवाह तुलसी से कराया। इसी घटना को याद रखने के लिए प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देव प्रबोधनी एकादशी के दिन तुलसी का विवाह शालिग्राम के साथ कराया जाता है।

150 रुपए तक बिन रहा गन्ने का मंडप

रविवार के दिन बाजार में गन्ने की दुकानें जगह-जगह लगी हुई देखी गई। पांच गन्नों का एक मंडल 80 रुपए से 150 रुपए तक में बिक रहा था। सोमवार को पूजा का दिन होने के कारण बाजार में खासी भीड़ रहेगी इसलिए लोग एक दिन पहले ही पूजा का सामान खरीद कर ले जाते नजर आए। कई लोग मोल भाव के साथ गन्ना ले जाते दिखे।