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गरीबी और गरीबों की विरोधाभासी तस्वीर के मायने क्या?

गरीबी उन्मूलन के दावे और मुफ्त राशन पाने वालों की बढ़ती संख्या आत्मनिर्भरता की कमी को उजागर कर रही है।

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poverty

-मंतोष कुमार सिंह
गरीबी
और समृद्धि का मुद्दा देश और प्रदेश में हमेशा से चर्चा का विषय रहा है। इसी कड़ी में हाल ही में नीति आयोग और आर्थिक सर्वेक्षण ने जो रिपोर्टें प्रस्तुत की हैं, वे विरोधाभासी हैं। नीति आयोग के अनुसार नौ साल में मध्यप्रदेश में 2 करोड़ 30 लाख लोगों को गरीबी से बाहर निकाला गया है। यह आंकड़ा राज्य की विकास नीतियों और योजनाओं की सफलता की ओर इशारा करता है। इस रिपोर्ट के अनुसार, गरीबी उन्मूलन के लिए सरकार ने विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं को लागू किया है। लेकिन दूसरी ओर आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़े कुछ और ही कहानी बयान कर रहे हैं। राज्य में 5 करोड़ 37 लाख लोग मुफ्त राशन ले रहे हैं। इसका मतलब यह है कि ये लोग अब भी सरकार की मदद पर निर्भर हैं। यह तथ्य गरीबी घटने के दावों पर सवाल खड़ा करता है। गरीबी रेखा से ऊपर उठने के बावजूद बड़ी संख्या में लोग अब भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हो सके हैं।

गरीबी घटने और गरीब बढऩे की इस तस्वीर को समझना जरूरी है। नि:शुल्क राशन पाने वालों की संख्या राज्य की कुल आबादी का लगभग 70 प्रतिशत है। इससे यह स्पष्ट होता है कि गरीबों की निर्भरता में कमी नहीं आई है, बल्कि सरकारी सहायता पर उनकी निर्भरता बढ़ी है। गरीबी उन्मूलन की कोशिशों के बावजूद, इस तथ्य से स्पष्ट हो रहा है कि आर्थिक विकास की प्रक्रिया में निचले तबके के लोगों की आत्मनिर्भरता पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। गरीबों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में प्रभावी निवेश की आवश्यकता है। निर्बल, निसहाय और कमजोर तबके को मदद करते रहना चाहिए, पर साथ ही यह कोशिश भी करनी चाहिए कि हर तबका अपने पैरों पर खड़ा हो सके। इसके लिए उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने पर ध्यान केंद्रित करना होगा।

ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाने, उद्यमशीलता को प्रोत्साहन देने और शिक्षा में सुधार के काम हाथ में लेने होंगे, तभी वास्तविक अर्थों में गरीबी और गरीब दोनों में कमी आएगी। आंकड़ों के विरोधाभास को भी खत्म करना होगा। सरकारी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन और दीर्घकालिक दृष्टिकोण इस समस्या का समाधान कर सकता है। प्रदेश में गरीबी उन्मूलन के प्रयास तभी सार्थक होंगे जब गरीबों को आत्मनिर्भर बनने के लिए साधन और अवसर प्रदान किए जाएं।

mantosh.singh@epatrika.com