
Wonder Innovation in Indian Farming
छिंदवाड़ा .देश, प्रदेश को मक्का की हाइब्रीड किस्में देने के लिए मशहूर छिंदवाड़ा अनुसंधान केंद्र में मक्का की एक नई वेरायटी पर काम चल रहा है। अनुसंधान केद्र में मक्का का एेसा बीज तैयार किया जा रहा है जिसका पौधा फल (भुट्टा) तो देगा ही वहीं फल तोडऩे के बाद उसका पौधा हरा ही रहेगा जो किसानों को पशुओं के चारे के रूप में दिया जा सकेगा या फिर उसे खेत में ही बिछाकर खाद के रूप में उपयोग किया जा सकेगा।
जेएच 1033 के नाम से तैयार होने वाली मक्का की किस्म पर अभी अनुसंधान चल रहा है। सब कुछ ठीक रहा तो चार-पांच वर्षों में यह बीज किसानों को उलब्ध होने लगेगा। इसके अलावा दो और किस्में जेएम 215 और जेएम 218 पर अनुसंधान चल रहा है यह बीज पानी की अधिकता और कम पानी में भी पौधों को खराब नहीं होने देगा और उत्पादकता को भी प्रभावित नहीं करेगा। देश भर में मक्का को लेकर विशेष अनुसंधान इन दिनों किया जा रहा है। उसमें छिंदवाड़ा भी प्रमुख है। यहां मक्का अनुसंधान केद्र में जहां नई हाईब्रीड किस्मों को तैयार किया जा रहा है उसमें बदल रहे पर्यावरणीय मौसम को देखकर प्रयोग किए जा रहे हैं। इसे देखने के लिए मंगलवार को आईसीएआर लुधियान के डॉ. सुनील निलयाम और डॉ. ए सिन्हा मंगलवार को छिंदवाड़ा आए। यहां उन्होंने अनुसंधान केंद्र और मक्के पर किए जा रहे प्रयोग क्षेत्र का अवलोकन किया और राष्ट्रीय स्तर पर मानकों के आधार पर जो ट्रायल किए जा रहे हैं उसे भी देखा।
छिंदवाड़ा में बेहतर काम हुआ
देश के कई अनुसंधान केंद्रों में मक्का पर काम किया जा रहा है। छिदंवाड़ा स्थित मक्का परियोजना में काम बहुत बेहतर है। हमने विभिन्न बिंदुओं पर यहां अवलोकन किया और इन विषयों पर यहां के वैज्ञानिकों से भी चर्चा की ताकि हम किसानों को उत्तम किस्म उपलब्ध करा सकें।
डॉ. ए सिन्हा, वैज्ञानिक और विशेषज्ञ
बीज बेहतर तरीके से करेंगे सर्वाइव
हम एेसे बीजों को तैयार कर रहे हैं जो अति वर्षा और बहुत कम वर्षा में भी बेहतर तरीके से सर्वाइव कर सके। छिंदवाड़ा में हमने सूक्ष्मता से यहां चल रहे अनुसंधान को देखा। जो १५-१६ ट्रायल किए जा रहे हैं वे भी देखे। भविष्य में किसानों को बेहतर बीज उपलब्ध कराए जा सकेंगे।
डॉ. सुनील निल्याम, वैज्ञानिक और प्रजनक
विपरीत मौसम का मिलेगा फायदा
जिस तरह से मौसम बदल हो रहा है व पानी की अनिश्चितता बनी हुई है, उसमें एेसी किस्में तैयार की जा रही है ताकि ज्यादा समय तक अवर्षा की स्थिति में भी जमीन में नमी का संरक्षण हो सके। आने वाले वर्षों में एेसी किस्में किसानों को उपलब्ध होंगी ताकि वे विपरीत मौसम का फायदा ले सकें।
डॉ. वीके पराडकर, वैज्ञानिक और प्रमुख मक्का परियोजना
Published on:
11 Oct 2017 12:11 pm
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