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छिंदवाड़ा। राज्य शासन द्वारा पातालकोट को जैव विविधता विरासत स्थल घोषित जरूर किया गया, लेकिन इस क्षेत्र के जंगली पेड़-पौधों एवं जड़ी-बूटियों के पारम्परिक ज्ञान को संरक्षित करने की कोई योजना अब तक नहीं बनाई गई है। विश्व जैव विविधता दिवस 22 मई को जब पूरा जिला अपनी इस प्राकृतिक सम्पदा को याद करेगा तो यह कमी सबसे ज्यादा अखरेगी।
10 जनवरी 2019 के राजपत्र में पातालकोट को जैव विविधता विरासत स्थल घोषित किया गया था। राजपत्र की अधिसूचना के मुताबिक पातालकोट पूर्व एवं पश्चिम वन मंडल के अधीन संरक्षित वन क्षेत्र 8367.49 हैक्टेयर में फैला हुआ है। यह स्थल 1700 फीट गहरी घाटी तथा छह मिलियन वर्ष की अनुमानित आयु वाला पारिस्थितिकी एवं दुर्लभ वनस्पति तथा प्राणियों वाला क्षेत्र है। इसमें ब्रायोफा इट्स एवं टेरिडोफ गइटस भी है। इस क्षेत्र के समुदाय विशेषकर भारिया को जंगली पेड़-पौधे एवं जड़ी बूटियों का अनोखा पारम्परिक ज्ञान है जिसका उपयोग वे औषधियां प्रभावी बनाने करते हैं। उस समय राज्य शासन ने राज्य जैव विविधता बोर्ड को इसके विकास का जिम्मा सौंपा था। अभी तक जैव विविधता बोर्ड भोपाल के अधिकारियों ने इस क्षेत्र को संरक्षित करने की कोई प्लानिंग नहीं बनाई है। जबकि इस क्षेत्र के जड़ी-बूटियों और उनके पारम्परिक ज्ञान को संरक्षित करने की आवश्यकता है।
ये जैव विविधता भी छिंदवाड़ा को रखती है हमेशा आगे
1. जिले के 11.80 लाख हैक्टेयर में से 3.51 लाख हैक्टेयर यानी कुल क्षेत्रफल के 29.73 प्रतिशत हिस्से में जंगल है। ये वन क्षेत्र न केवल पर्यावरण की दृष्टि से शुद्ध ऑक्सीजन, वर्षा जल और औषधियां उपलब्ध कराते हैं बल्कि स्थानीय रहवासियों के लिए रोजगार का भी साधन है।
2. छिंदवाड़ा को पेंच नेशनल पार्क और सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के बीच टाइगर के आवागमन का कॉरीडोर माना जाता है। घने और विरले
जंगलों से गुजरते कॉरीडोर में नियमित रूप से टाइगर समेत अन्य वन्य प्राणियों का आवागमन होता है।
3.पातालकोट में गिद्धों का आवास हैं तो वहीं हिरन, सांभर, पेंगोलिन समेत अन्य वन्य प्राणी पाए जाते हैं। अंधा बगुला, सारस, टिटहरी, तोता, कोयल, मोर समेत अन्य पक्षी प्रजातियों को सहज ही देखा जा सकता है।
4. जिले में 53 वानिकी प्रजातियों को सूचीबद्ध किया गया है। इनमें महुआ, तेन्दू, आचार, चिरोटा/चिरायता, कालमेघ,आम, वन तुलसी,बहेड़ा, जामुन, अर्जुन और बीजा आदि शामिल हैं।
5. जल संसाधन में पेंच, कन्हान, जाम, कुलबेहरा समेत अन्य नदियां हैं। इसके अलावा 138 छोटे-बड़े जलाशय हैं। इन पर पूरा जनजीवन निर्भर है।
पातालकोट में मिले थे हजारों साल पुराने जीवाश्म: दो साल पहले 2019 को कोलकाता के भू-वैज्ञानिक भूपेन्द्र सिंह ने पातालकोट में हर्राकछार के नजदीक पत्थर में तब्दील लकडिय़ों के हजारों साल पुराने जीवाश्म की खोज की थी। बाद में प्राकृतिक सौंदर्य के भरपूर जैवविविधता के रहस्य को समेटे इस घाटी की उम्र छह मिलियन वर्ष होने की वैज्ञानिक पुष्टि हुई। वैज्ञानिक सर्वे से यह स्पष्ट हुआ कि ये हजारों साल पुरानी लकडिय़ां है, जिसने पत्थरों की शक्ल ले ली है। ये जुरासिक समय की हो सकती है। इस खोज और अन्वेषण को भी आगे नहीं बढ़ाया गया है।
पातालकोट को जैव विविधता विरासत स्थल घोषित किया गया है। इसके अनुरूप जड़ी-बूटियों और पेड़-पौधों के प्राकृतिक ज्ञान को संरक्षित करने की आवश्यकता है। जिसे हम अगली पीढ़ी के लिए सुरक्षित रख सकें।
आरएस कुशवाहा, सेवानिवृत्त एसडीओ वन विभाग
जैव विविधता में पातालकोट का अहम् रोल है। इस क्षेत्र में जड़ी-बूटियों के संरक्षण और पारंपरिक ज्ञान को सहेजने का प्रोजेक्ट बनाकर राज्य शासन को भेजा गया है। इसकी सरकारी मंजूरी आते ही कुछ करना संभव हो पाएगा।
-केके भारद्वाज, सीसीएफ छिंदवाड़ा
Published on:
22 May 2021 11:05 am
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