
Dragon fruit: ड्रैगन फ्रूट की खेती से मालामाल हो रहा युवा किसान
बी.के पाठे
छिंदवाड़ा. खेती बाड़ी का मतलब खेत में मिट्टी से सना हुआ पसीने से लतपथ किसान नहीं है। बदलते दौर के साथ अब किसान का परिवेश और उसके खेती किसानी करने का तौर तरीका भी बदल रहा है। एक दौर था जब पारम्परिक खेती से एक कदम आगे बढ़कर जिले के किसानों ने आधुनिक खेती पर अपना हाथ आजमाया और वे सफल भी हुए हैं। जिले में आज ऐसे सैकड़ों किसान हैं जिन्होंने कृषि क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई है।
धोती कुर्ता और पजामा पहने हुए सिर पर टोपी या फिर गमच्छा बांधे किसान खेतों में काम करते नजर आए यह परिदृश्य अब बदल चुका है, क्योंकि बुजुर्ग किसानों की युवा पीढ़ी पढ़ लिखकर खेती को व्यवसाय में बदल रही है और आज की मांग भी यही है। किसान अब आधुनिक से अत्याधुनिक खेती की ओर बढ़ चुका है जिसका फायदा उन्हें मिल रहा है साथ ही जिला भी समृद्ध हो रहा। आधुनिक खेती से एक कदम आगे अत्याधुनिक खेती इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि जिले में अब विदेशों में उगाए जाने वाले फसलों या यूं कहें की विदेशों की मुख्य फसलों की पैदावार जिले के युवा किसान भी लेने लगे हैं। इस तरह की फसलों का स्वयं तो उत्पादन ले ही रहे हैं साथ ही अन्य किसानों को भी इस तरह की फसलों का उत्पादन लेने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। ताकि अन्य किसान भी समृद्ध बने और आर्थिक रूप से मजबूत हो सके।
थाईलैंड के फल की खेती
शहर की प्रोफेसर कॉलोनी निवासी अभिषेक पिता एस.एल गेडाम की कृषि भूमि जिला मुख्यालय से करीब 17 किमी दूर नरसिंहपुर रोड स्थित नकझिर ग्राम में है। पढ़ें लिखे युवा किसान अभिषेक गेडाम नकझिर ग्राम में ड्रैगन फ्रूट की खेती कर रहे हैं। परिवार के साथ घूमने निकले अभिषेक गेडाम ने महाराष्ट्र के सोलहपुर के आस-पास और दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में ड्रैगन फ्रूट की खेती देखी थी, यहीं से उन्होंने इस खेती को अपनाने का मन बनाया। अभिषेक बताते हैं कि उन्होंने तमाम जानकारियां जुटाने के बाद थाईलैंड से डेढ़ एकड़ भूमि के लिए ड्रैगन फ्रूट के पौधे बुलवाए थे। वर्ष 2017 में ड्रैगन फ्रूट के पौधे कतार में सीमेंट के करीब पांच फीट ऊंचे पोल के करीब से लगाए ताकि पौधे पोल के सहारे खड़े रह सके। ड्रिप के माध्यम से सिंचाई की जाती है।
दो बार फलों का उत्पादन ले चुके
ड्रैगन फूड की दो फसलें ले चुके अभिषेक बताते हैं कि एक बार पौधे लगाने के बाद करीब 20 वर्ष तक इन्हीं पौधों से उपज ली जा सकती है। फसल जून माह में आते हैं और प्रतिकिलो 150 से 200 रुपए के दाम से बिकते हैं। वह अभी तक भोपाल, इंदौर, जबलपुर और नागपुर में ड्रैगन फूड बेच चुके हैं। छिंदवाड़ा में भी उन्होंने स्टॉल लगाकर ड्रैगन फ्रूट बिकवाए हैं, जिसके बाद लोगों ने इसका स्वाद चखा है। अभिषेक बताते हैं कि एक बार पौधे लगाने, सीमेंट पोल का खर्च आता है। सबसे खास बात यह है कि ड्रैगन फ्रूट के बीच अंतरवर्तीय फसलें भी ली जा सकती है।
Published on:
10 Mar 2022 02:34 pm
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