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कुख्यात ददुआ की बिना इजाज़त हिलता भी नहीं था”तेंदू पत्ता” गैंग के पास कभी पहुंचता था करोङों का कमीशन

ददुआ के जिंदा रहने के दौरान किसी की क्या मजाल की वो तेंदू पत्ता को हाथ भी लगा दे।  

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Before dacoit Dadua have

चित्रकूट. बुंदेलखण्ड का हरा सोना कहे जाने वाले तेंदु पत्ता को तोडऩे का समय आ गया है। मई से लेकर जून के अंतिम सप्ताह तल इस पत्ते की तुड़ाई का कार्य किया जाता है। हर साल सरकार को करोङों का राजस्व प्राप्त होता है तेंदू पत्ता से। चित्रकूट के पाठा क्षेत्र में इसके पेड़ों की खान है। इस इलाके में बहुतायत मात्रा में तेंदू पता के पेड़ पाए जाते हैं, इसी तेंदू पत्ता को तोडऩे के लिए कभी कुख्यात दस्यु ददुआ की इजाज़त लेनी पड़ती थी और इजाज़त करोङों रुपये के कमीशन के रूप में होती थी। ददुआ के जिंदा रहने के दौरान किसी की क्या मजाल की वो तेंदू पत्ता को हाथ भी लगा दे।

बुन्देलखण्ड में हरा सोना के नाम से जाना जाने वाला तेंदू पत्ता कभी कुख्यात ददुआ की मर्जी के बिना हिलता भी नहीं था। पाठा का बच्चा बच्चा यह जनता है कि ददुआ तेंदू पत्ता की तोड़ाई का कार्य बिना मोटा कमीशन लिए शुरू नहीं होने देता था।

पहले ददुआ को कमीशन दो फिर...

बीहड़ का इतिहास गवाह है कि तेंदू पत्ता के तोडऩे का समय जब आता था तो गैंग की तरफ से फरमान जारी हो जाता कि पहले ददुआ को कमीशन दो फिर पत्ता तोड़ाई का कार्य शुरू करो। आज भी तेंदू पत्ता का जिक्र होने पर ददुआ का नाम जरूर आता है लोगों की जुबां पर। क्या पुलिस और क्या प्रशासन किसी की भी हिमाक़त नहीं होती थी कि वो ददुआ के बिना परमीशन जंगल में उतर जाए और पत्ता तोडऩे का कार्य शुरू हो जाए।

ददुआ की कमाई का मजबूत जरिया

बीहड़ में खौफ का दूसरा नाम रहे ददुआ ने इसलिए अपने दस्यु इतिहास में अपहरण की चंद वारदातों को अंजाम दिया क्योंकि उसकी कमाई का मजबूत जरिया था तेंदू पत्ता। हर साल करोङों रुपये का कमीशन रंगदारी तेंदू पत्ता तोडऩे के दौरान ददुआ तक पहुंच जाता था जिससे गैंग की आर्थिक स्थिति काफी मजबूत हो गई थी। ददुआ ने कमाई का लेखा जोखा रखने के लिए गैंग में एक मुंशी को भी रखा हुआ था जो रुपयों पैसों का हिसाब रखता था।

बीहड़ में पहुंचते थे रुपये

उधर बीहड़ से फरमान इधर 24 घण्टे के अंदर कमीशन का इंतजाम और फिर बीहड़ में उसे पहुंचाने की जि़म्मेदारी. कुछ ऐसा ही था ददुआ के खौफ का तिलिस्म. पत्ता तोडऩे का ठेका लेने वाले ठेकेदार गैंग के बताए स्थान पर कमीशन पहुंचाने का काम करते थे. ददुआ के समय इस कार्य से जुड़े एक ठेकेदार(नाम न प्रकाशित होने की शर्त पर) ने बताया कि पत्ता तोडऩे के लिए प्रशासन की नहीं बल्कि ददुआ की इजाज़त लेनी पड़ती थी और प्रशासन भी उस समय इंतजार में रहता था कि कब बीहड़ से दस्यु सरगना का फरमान आएगा पत्ता तोडऩे के लिए।

ददुआ के नक्शे कदम चले बीहड़ के दूसरे शैतान

22 जुलाई 2007 को एसटीएफ से मुठभेड़ के दौरान मारे गए दस्यु सरगना ददुआ के बाद बीहड़ के खूंखार दस्यु बलखडिय़ा व ठोकिया ने भी अपनी आर्थिक ताकत इसी माध्यम से बढ़ाई। हालांकि जितना खौफ ददुआ का होता था उतना इन दस्यु सरगनाओं का नहीं था तेंदू पत्ता तोड़ान के समय। बलखडिय़ा व ठोकिया के बाद वर्तमान में सक्रिय कुख्यात साढ़े पांच लाख के इनामी बबुली कोल ने भी अपने आकाओं की तरह पत्ता तोड़ान में कमीशन लेने का प्रयास किया, लेकिन उतना कामयाब नहीं हो पाया। सलाखों के पीछे कैद दस्यु गोप्पा ने भी यही प्रयास किया था।

तैयार होती है बीड़ी

तेंदू पत्ता से तैयार होती है बीड़ी, वही बीड़ी जिससे मजदूर अक्सर कश लगाते देखे जा सकते हैं। तेंदू पत्ता के माध्यम से सरकार और व्यापारी हर साल करोड़ों का मुनाफा कमाते हैं।