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बुंदेलखंड राज्य: सिर्फ एक मुद्दा, बुंदेलियों के साथ छलावा

बुंदेलखंड, एक ऐसा शब्द जो राजनीति और राजनीतिक रोटी सेंकने वालों के लिए जीता जागता मुद्दा...

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बुंदेलखंड

बुंदेलखंड राज्य: सिर्फ एक मुद्दा, बुंदेलियों के साथ छलावा

चित्रकूट. बुंदेलखंड, एक ऐसा शब्द जो राजनीति और राजनीतिक रोटी सेंकने वालों के लिए जीता जागता मुद्दा। करोङों अरबों के पैकेज देने के चुनावी वादे हों या मूलभूत सुविधाओं को प्रदान करने की बात, हर जगह बुंदेलखंड को प्राथमिकता देने का भरपूर राजनीतिक प्रयास किया जाता है और किया जाता रहा है। इन सबके बीच बुंदेलियों के दिलों में कभी अलग बुंदेलखंड राज्य की सुलगती चिंगारी को हवा देकर राजनीति की बिसात पर शह मात का खेल खेलने वाली कूटनीतिक रणनीति। हर मोड़ पर बुंदेलखंड को भुनाया गया। और शायद आज बुंदेलखंड राज्य निर्माण सिर्फ एक मुद्दा बनकर रह गया है उन राजनीतिक ख्वाहिशमन्दों के लिए जो बुन्देली राजनीति में खुद के स्थान को प्रदर्शित करना चाहते हैं। हां यह बात जरूर है कि कभी पृथक् बुंदेलखंड राज्य के लिए वृहद (बड़े) स्तर पर आंदोलन चलाया गया था, लेकिन आपसी मतभेद व राजनीतिक आकाओं की कूटनीति का शिकार होकर यह आंदोलन हाशिए पर चला गया और टूट गए इस आंदोलन को चलाने वाले। अलबत्ता यूपी के 2017 के विधानसभा चुनाव में उमा भारती ने जरूर एक बार फिर अलग बुंदेलखंड राज्य का राग आलाप कर राजनीतिक माहौल की सरगर्मी बढ़ा दी थी परंतु वह भी शायद एक चुनावी रणनीति थी जो पांसे के रूप में बुंदेलखंड में फेंकी गई थी और जिसका सुखद परिणाम बीजेपी को मिल भी गया। परन्तु उसके बाद फिर नेपथ्य के पीछे चला गया बुंदेलखंड राज्य निर्माण का मुद्दा।

छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड व तेलंगाना राज्य बनने के बाद बुंदेलखंड के बाशिंदों को भी इस ख्वाहिश के पर लग गए थे कि शायद अब पृथक बुंदेलखंड राज्य का सपना भी साकार हो जाए। उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश के बीच साँसे ले रहे बुंदेलियों को गाहे बगाहे इस वादे का लॉलीपॉप देकर लुभाया गया कि अमुक सरकार बनने पर अलग बुंदेलखंड राज्य के विषय में गहराई से विचार किया जाएगा ,ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं ,पिछले वर्ष(2017) के विधानसभा चुनाव की बात करें तो झांसी में एक जनसभा के दौरान बीजेपी की फायरब्रांड नेता उमा भारती ने पृथक बुंदेलखंड राज्य के मुद्दे को हवा देते हुए उनकी सरकार बनने पर इस विषय के बारे में गहनता से सोचने का वादा किया था ,परन्तु चुनाव हो भी गया और पूरे बुंदेलखंड में एक तरफ से भगवा परचम लहरा उठा लेकिन दोबारा उमा भारती द्वारा इस मुद्दे को हवा नहीं दी गई। कारण साफ़ है कि आज पृथक बुंदेलखंड राज्य ,बुंदेलखंड पैकेज ,सूखा राहत आदि कई ऐसे प्रमुख मुद्दे हैं जिनकी डोली पर सवार होकर राजनीतिक बुंदेलखंड में आते हैं और इन मुद्दों की चिंगारी सुलगाकर बुंदेलियों को छलने का कार्य बड़ी निपुणता से करते हैं। 2009 के लोकसभा चुनाव में कॉंग्रेस ने भी इन मुद्दों का पांसा फेंककर बुंदेलखंड में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की थी लेकिन उस समय धुर विरोधी विपक्षी पार्टी बीजेपी ने पृथक बुंदेलखंड राज्य को लेकर कॉंग्रेस को छल कपट वाला दल बताया था और कॉंग्रेस को काफी हद तक बीजेपी की इस मुहीम से घाटा भी हुआ था। मतलब साफ़ है कि जो दल पृथक बुंदेलखंड राज्य की बात करेगा उसका विरोध करते हुए विपक्षी दल उसे झूठा करार देगा और फिर वही विपक्षी दल खुद सत्ता में आने के लिए पृथक बुंदेलखंड राज्य के मुद्दे का राग अलापना शुरू कर देता है ,यही होता आया है देश की दो बड़ी धुर विरोधी पार्टियों बीजेपी व कॉंग्रेस के द्वारा।

बुंदेलखंड राज्य आंदोलन- एक नजर

आजादी के पहले अपना खुद का अस्तित्व रखने वाला बुंदेलखंड आजाद भारत के बाद दो हिस्सों में बंट गया, एक मध्य प्रदेश तो दूसरा हिस्सा उत्तर प्रदेश में आ गया। बुंदेलखण्ड को अलग राज्य बनाने की मांग करते हुए इस आंदोलन को शुरू करने का काम किया था शंकर लाल मेहरोत्रा ने। उनके नेतृत्व में 17 सितम्बर 1989 को बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा का गठन किया गया। यह आंदोलन चर्चा में तब आया जब पूरे बुंदेलखंड में टीवी प्रसारण बंद करने का आंदोलन किया गया। यह काफी सफल आंदोलन था। इस आंदोलन के दौरान बड़ी संख्या में बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां हुईं।

आंदोलन को तेज धार देते हुए मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने 1994 में मध्य प्रदेश विधानसभा में पृथक राज्य की मांग को लेकर पर्चे फेंके। उत्साह से लबरेज मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने सङ्गठन प्रमुख शंकर लाल मेहरोत्रा के नेतृत्व में 1995 में संसद भवन में पर्चा फेंक नारेबाजी की। इस घटना के बाद शंकर लाल मेहरोत्रा सहित कई कार्यकर्ताओं को संसद् भवन में कैद करके रखा गया था। 1995 में ही संसद भवन का घेराव करते हुए जंतर मंतर पर क्रमिक अनशन शुरू किया गया जो उमा भारती के आश्वासन के बाद समाप्त हुआ। ये वो दौर था जब बुंदेलखंड राज्य आंदोलन अपने चरम पर था और चारों तरफ बुंदेलियों की बस एक ही मांग थी कि उन्हें पृथक बुंदेलखंड राज्य चाहिए।

वर्ष 1998 में यह आंदोलन उग्र हो उठा। बुंदेलखंडी पृथक राज्य निर्माण आंदोलन को लेकर सड़कों पर उतर आए। बुंदेलखंड के सभी जिलों में धरना प्रदर्शन चक्का-जाम रेल रोको आंदोलन आदि चल रहे थे कि इसी दौरान कुछ अवांछनीय खुराफाती तत्वों ने बरुआसागर के निकट 30 जून 1998 को बस में आग लगा दी जिसमें जनहानि हुई। इस घटना ने बुंदेलखंड राज्य आंदोलन को ग्रहण लगा दिया और बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा प्रमुख शंकर लाल मेहरोत्रा सहित 9 लोगों को गिरफ्तार कर रासुका लगा दिया गया। जेल में रहने के कारण शंकर लाल का स्वास्थ्य काफी खराब हो गया और बीमारी के कारण वर्ष 2001 में उनका निधन हो गया।

बुंदेलखंड राज्य निर्माण आंदोलन के पितामह शंकर लाल मेहरोत्रा के निधन के बाद यह आंदोलन धार नहीं पकड़ सका और धीरे धीरे अपना स्वरूप खोता गया। हांलाकि पृथक राज्य निर्माण के लिए कई सङ्गठन बने जिन्होंने हस्ताक्षर अभियान क्रमिक अनशन ज्ञापन रैली सम्मेलन धरना आदि के द्वारा आंदोलन को जगाने का प्रयास किया लेकिन कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ा। इस दौरान झारखण्ड छत्तीसगढ़ उत्तराखण्ड अलग राज्य बन गए जिसे बुंदेलियों को निराशा हुई कि उनका नेतृत्व करने वाला कोई नहीं।

एक बार फिर पृथक बुंदेलखंड राज्य आंदोलन को हवा देने का प्रयास किया गया मशहूर फ़िल्म अभिनेता राजा बुन्देला द्वारा। सन् 2012 के यूपी विधानसभा चुनाव में राजा बुन्देला ने बुंदेलखंड कांग्रेस के नाम से पार्टी बनाकर कई प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारा लेकिन धनबल बाहुबल व जातिगत समीकरण के आगे उनकी पार्टी को मुंह की खानी पड़ी क्योंकि इतने वर्षों के दौरान सपा बसपा भाजपा व कांग्रेस ने बुंदेलखंड में कई मुद्दों को हवा देते हुए अपनी जड़ें जमा ली थीं। इससे पहले राजा बुंदेला ने पूरे बुन्देलखण्ड में पृथक राज्य आंदोलन को लेकर वर्ष 2011 में पदयात्रा की व हस्ताक्षर अभियान चलाए पत्रकार वार्ता की व दिल्ली में भी धरना प्रदर्शन किया यही नहीं उन्होंने देश में पृथक राज्यों के लिए लड़ रहे लोगों को साथ लेकर संगठन भी बनाया लेकिन इन सबके बावजूद आंदोलन को वो धार नहीं मिल पाई जिसकी उसे दरकार थी।

वर्ष 2009 व 2014 के लोकसभा चुनाव में सभी पार्टियों ने बुन्देलखण्ड में आम जनसभा कर पृथक आंदोलन के जले पर नमक छिड़कते हुए खुद को बुन्देलखण्ड राज्य आंदोलन का समर्थक बताया लेकिन चुनाव के बाद सारे मुद्दे नेपथ्य के पीछे चले गए। कुछ ऐसा ही हाल रहा वर्ष 2012 व 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान जब पृथक बुन्देलखण्ड राज्य की बात को प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा हवा देने का प्रयास किया गया। 2017 में तो उमा भारती ने विधानसभा चुनाव की जनसभा के दौरान हमीरपुर में पृथक बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण का समर्थन करते हुए अपनी पार्टी को बुंदेलियों का सबसे बड़ा हितैषी घोषित किया था।

आज भी बुन्देलखण्ड एकीकृत पार्टी बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा बुन्देली सेना जैसे संगठन पृथक बुंदेलखंड राज्य के लिए प्रयासरत हैं लेकिन राजनीतिक दांवपेच के आगे इन सङ्गठनों की कवायद धरी की धरी रह जाती है। बुन्देली सेना के जिलाध्यक्ष अजीत सिंह बताते हैं कि मरते दम तक पृथक बुन्देलखण्ड राज्य की मांग जारी रहेगी सफलता चाहे जब मिले।

बहरहाल बुंदेलखंड राज्य निर्माण आज सिर्फ एक मुद्दा बनकर रह गया जिसे हर पांच साल बाद सफेदपोशों द्वारा भुनाया जाता है और छलावा किया जाता है हर बार बुंदेलियों के साथ जो ये सोचकर तसल्ली करते हैं एक न एक दिन उनका भी अपना एक अलग अस्तित्व होगा। जब उत्तराखंड झारखंड तेलंगाना अलग राज्य बन सकते हैं तो बुंदेलखंड क्यों नहीं।

अलग राज्य की हसरत है हर बुंदेलियों के दिल में

पृथक बुंदेलखंड राज्य की बात करने पर हर बुंदेली का दर्द उभर आता है और अलग बुंदेलखंड राज्य की हसरत उनकी आँखों में साफ़ दिखाई देती है। चाहे समाजसेवी हों या वयवसाई या फिर ग्रामीण तबके के जागरूक लोग सभी अपने बुंदेलखंड को एक अलग स्वरूप में देखना चाहते हैं।