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आत्मगुणों की खान थे आनन्द ऋषि

निम्बाहेड़ा. जो व्यक्ति भक्ति से जुड़ जाता है वह परमात्मा से जुड़ जाता है। अपने गुरु के प्रति समर्पित आनन्द ऋषि ने गुरुदेव के वचनों का अनुसरण करते हए अपने जीवन को निर्मल पावन बनाया।

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आत्मगुणों की खान थे आनन्द ऋषि

आत्मगुणों की खान थे आनन्द ऋषि

निम्बाहेड़ा. जो व्यक्ति भक्ति से जुड़ जाता है वह परमात्मा से जुड़ जाता है। अपने गुरु के प्रति समर्पित आनन्द ऋषि ने गुरुदेव के वचनों का अनुसरण करते हए अपने जीवन को निर्मल पावन बनाया।
यह विचार आनन्द जयश्री जन्मोत्सव के अंतर्गत संघ द्वारा आयोजित तीन दिवसीय कार्यक्रम के प्रथम दिन श्रमण संघीय आचार्य आनन्द ऋषि के जयंती महोत्सव के दौरान साध्वी जयश्री ने दिवाकर भवन में व्यक्त किए। साध्वी ने कहा कि आचार्य ने अपने गुरू की इतनी भक्ति की कि वे दीप शिखा बन गए और श्रमण संघ को ऊंचाइयों पर ले गए। शान्ति प्रियता, गंभीरता, मर्दुलता व विषम परिस्थितियों में भी धीरता थी। साध्वी राजश्री ने आचार्य श्री के जीवन से जुड़ी बातों से अवगत कराया। कहा कि आचार्य परोपकार, विनय, विद्या आदि गुणों की खान थे। स्वाध्याय साधना व शिक्षा प्रेमी थे। साध्वी समीक्षाश्री ने गीतिका प्रस्तुत की। अहमदनगर से आई रुपाली जैन ने विचार व्यक्त किए। आचार्य आनन्द ऋषि के जन्मदिवस पर सामूहिक आयम्बिल किया गया। इसका लाभ ज्ञानचन्द मुकेश कुमार ढेलावत परिवार ने लिया। संचालन मंत्री आनन्द सालेचा ने किया। .
चमत्कार श्रधेय में नहीं श्रद्धा में होता है
बेगूं. सिद्ध भवन में बिराजित साध्वी मुक्ति प्रभा ने धर्म सभा मेें कहा कि चमत्कार श्रधेय में नहीं श्रद्धा में होता है। श्रमण संघीय साध्वी मुक्ति प्रभा वर्षावास के लिए सिद्ध भवन में बिराजित है। शुक्रवार को साध्वीश्री ने श्रमण संघ के आचार्य आनन्द ऋषि महाराज के जन्म कल्याण दिवस पर उनकी जीवनी पर कहा कि गुरु के माध्यम से ही हम ज्ञान को प्राप्त करते हैं। गुरु हमें अंधेरें से उजाले की तरफ बढऩे का रास्ता दिखाते हैं। सही गलत का फर्क बताते हैं। इसलिए प्रभु से भी पहला स्थान गुरु का है। भारतीय संस्कृति में गुरु का महत्व, सम्मान और सच्ची निष्ठा और समर्पण का भाव हमेशा रहता आया है।
साध्वी ने कहा कि धर्म की महिमा निराली होती है। धर्म में श्रद्धा रखने से विकट संकट भी टल जाते हैं। सन्त धर्म के मार्ग को बतलाते हंै। संत का हृदय नवनीत के समान कोमल होता है। चातुर्मास के दौरान यहां आंजना देवी पोखरना के 19, सुशील सुराणा, विमला देवी सुराणा, सुमन देवी सुराणा, श्याम लाल कावडिय़ा, कनक लता कावडिय़ा एव सागर नाहर ने 8 उपवास के प्रत्याख्यान लिए। धर्म सभा में श्रमण संघ अध्यक्ष बलवन्त ङ्क्षसह सुराणा, चातुर्मास कमेटी अध्यक्ष ज्ञान मल रातडिय़ा, प्रकाश चंद्र लोढ़ा, सागर माल लोढ़ा आदि संघ के पदाधिकारी मौजूद थे।
गंगरार. साध्वी पारस एवं सुप्रभा के सानिध्य में यहां वर्षावास चल रहा है। शुक्रवार को आचार्य आनंद ऋषि का जन्मोत्सव मनाया गया। साध्वी ने प्रवचन में त्याग के महत्व को समझाया एवं आचार्य आनंद ऋषि के जीवन पर कहा कि आचार्य की छत्रछाया में सारा संघ चला। उन्होंने छुआछूत की भावनाओं को लोगों के दिल से निकालने का प्रयास किया। वे बहुत ही सहज व्यक्तित्व के गुणों के धनी थे। उन्होंने 13 वर्ष की अवस्था में ही दीक्षा को अंगीकार किया था एवं 79 वर्ष तक दीक्षा संयम का पालन किया। सीखने की कोई उम्र नहीं होती है। निश्चय ²ढ़ हो तो किसी भी उम्र में ज्ञान को अर्जन किया जा सकता है। जयंती पर 59 आयंबिल के तप हुए। मंच का संचालन सागर मल सुराणा ने किया। महिला मंडल मंत्री पूनम कर्णावट ने उद्बोधन दिया। स्टेशन युवक मंडल मंत्री अशोक कोचिटा, संघ के अध्यक्ष कोमल मोदी आदि ने विचार व्यक्त किए।
मुर्छा में नही होश में जिये-मुनि युग प्रभ
चित्तौडग़ढ़. जन्म मिलता हैं मृत्यु आती है लेकिन जीवन को अर्जित करना पड़ता है। जो जीवन को अर्जित करने वाले होते हैं उन्हीं का स्मरण किया जाता है। उनकी ही जयंती मनाई जाती है। उक्त विचार मंगलवाड़ चौराहा स्थित पौषधशाला में श्रोताओं के समक्ष मधुर व्याख्यानी मुनि युग प्रभ ने व्यक्त किये ।
मुनि ने कहा कि जन्म व मृत्यु व्यक्ति के हाथ में नहीं है। जीवन, अगर जीवन में पंसद करने की कला आ जाती है तो मानव जीवन को महान बना सकता है। पंसद से मानव हैवान, शैतान, इंसान व भगवान बन सकता है। अगर जीवन में दुर्गणों को पंसद किया तो मानव शैतान व सद्गुुणों से इंसान व भगवान बन जाएगा। आज मानव को सारी कलाएं आ जाती है लेकिन पंसद की कला में मानव थोड़ा सा कमजोर हो जाता है। मुनी ने कहा कि मरण तो सभी का होता है लेकिन स्मरण उन्ही का होता है जो जागकर के जीवन को जीने वाले होते है। जो होश में जीता है वो होशीयार होता है जो मुर्छा में जीता है वह मूर्ख कहलाता है।