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अमृत काल में ‘झोले’ वाला स्टेशन: न सिग्नल, न प्लेटफॉर्म…वंदे भारत के दौर में आज भी बिकते हैं मुहर लगे कागज के छोटे टिकट

चित्तौड़गढ़ जिले के महाराज की नेतावल हॉल्ट पर आज भी प्लेटफॉर्म नहीं है। यात्री गिट्टियों पर चढ़कर ट्रेन पकड़ते हैं। 15 साल से महेंद्र सिंह शक्तावत अकेले टिकट सेवा संभाल रहे हैं। रात में न रोशनी और न सुरक्षा। डिजिटल इंडिया के बीच जमीनी हकीकत सवाल खड़े कर रही है।

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Bhilwara Netwal Station Amrit Kaal Reality No Signal No Platform Stamped Paper Ticket Still Sold in Vande Bharat Era

यात्रियों के टिकट काटते हुए बुजुर्ग (फोटो- पत्रिका)

भीलवाड़ा: भारतीय रेलवे आज वंदे भारत की गति और अमृत भारत स्टेशनों की भव्यता का उत्सव मना रहा है। लेकिन चित्तौड़गढ़ जिले से चंद किलोमीटर दूर नेतावल की पटरियों पर विकास की ये चमक फीकी पड़ जाती है।

यहां स्टेशन का मतलब कोई कंक्रीट की आलीशान इमारत नहीं, बल्कि एक बुजुर्ग का झोला है। यहां ट्रेन आती भी है और रुकती भी है, लेकिन यात्रियों के स्वागत के लिए प्लेटफॉर्म नहीं, बल्कि नुकीली गिट्टियां और धूल भरी पगडंडियां हैं।

नेतावल का यह स्टेशन चीख-चीख कर कह रहा है कि सरकारें भले ही डिजिटल इंडिया का दम भरें। लेकिन देश का एक बड़ा हिस्सा आज भी उन गुमनाम नायकों के भरोसे चल रहा है, जिनके दिल में सेवा का भाव और हाथ में ईमानदारी का झोला है।

पटरियों पर बैठा 'वन-मैन आर्मी'

धूल उड़ाती पगडंडी से एक बुजुर्ग को हाथ में पुराना झोला लिए पटरियों की ओर आते देखना यहां की रोज की तस्वीर है। ये हैं महेंद्र सिंह शक्तावत, साल 2011 से यानी पिछले 15 सालों से महेंद्र सिंह यहां के 'अघोषित स्टेशन मास्टर' हैं।

जब दुनिया क्यूआर कोड से टिकट बुक कर रही है, तब ये बुजुर्ग अपनी स्याही वाली मुहर और कागज के छोटे टिकटों के साथ भारतीय रेल की सादगी को जीवित रखे हुए हैं।

साहब, दिन भर में आठ ट्रेनें रुकती हैं। अगर मैं नहीं आऊंगा तो 10 पंचायतों के मुसाफिर बेटिकट रह जाएंगे। सरकार ने प्लेटफॉर्म नहीं बनाया तो क्या हुआ, सेवा तो करनी ही है।
-महेंद्र सिंह शक्तावत, टिकट एजेंट

विसंगति: गिट्टियों पर 'जंग' जीतते यात्री

रेलवे की फाइलों में यह सिर्फ एक 'हॉल्ट' है, लेकिन जमीन पर यह एक मानवीय संकट है। प्लेटफॉर्म न होने से बुजुर्गों और महिलाओं को करीब तीन फीट की ऊंचाई फांदकर ट्रेन में चढ़ना पड़ता है।

सूर्यास्त के बाद यहां न रोशनी है और न सुरक्षा। यात्री मोबाइल टॉर्च के भरोसे ट्रेन का इंतजार करते हैं। जहां रेलवे 'रेल नीर' बेचता है, वहीं महेंद्र सिंह भामाशाहों के सहयोग से यात्रियों को मुफ्त पानी पिलाते हैं।

पत्रिका के तीन तीखे सवाल

  • बजट का 'ब्लैक होल' कहां है? सवा लाख करोड़ के रेल बजट में क्या उन 10 पंचायतों के लिए एक प्लेटफॉर्म की जगह नहीं है, जो रेलवे को साल का लाखों का राजस्व दे रही हैं?
  • हादसे का जिम्मेदार कौन? बिना प्लेटफॉर्म के गिट्टियों से ट्रेन में चढ़ते वक्त अगर कोई हादसा होता है, तो क्या रेलवे अपनी फाइलें दिखाकर जिम्मेदारी से बच पाएगा?
  • क्या 'अमृत' सिर्फ बड़े शहरों के लिए? अमृत भारत योजना के नक्शे में नेतावल जैसे स्टेशन क्यों छूटे हुए हैं? क्या बुनियादी ढांचा खड़ा करने के लिए सिर्फ 'कमीशन' ही पैमाना होना चाहिए?

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