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राजस्थान का ऐसा दुर्ग जहां चढऩे में हाथियों के भी आते थे पसीने, आज सीना तान शौर्य की गाथा गाता है ये किला

दुर्ग के सातों द्वार के साथ जुड़ी है गौरव गाथा, दुर्ग के हर द्वार की अपनी ही कहानी...
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चित्तौड़गढ़

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Dinesh Saini

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Updated: 29 May 2018, 4:44 PM IST

chittorgarh

चित्तौडगढ़़। विश्व विख्यात Chittorgarh Fort पर प्रवेश के सात द्वार है। इन द्वारों को पार कर ही दुर्ग पर पहुंचा जा सकता है। कभी रियासतकाल में रात्रि को यह दरवाजे निर्धारित समय पर बंद होते थे तथा खुलते थे। आज भी इन दरवाजों पर प्राचीन कलात्मक किवाड़ लगे हैं।

इन दरवाजों के नाम आज भी यथावत है। इन दरवाजों के नामों से जुड़े तथ्य भी हैं। इन दरवाजों में प्रथम द्वार पाडनपोल, द्वितीय भैरो पोल, तृतीय हनुमान पोल, चतुर्थ गणेश पोल, पंचम जोरला पोल, षष्ठ लक्ष्मण पोल और सांतवा दरवाजा राम पोल हैं। दुर्ग निवासी पंडित अरविंद भट्ट ने बताया कि रिसायत काल में दुर्ग को कई बार युद्ध जैसी परिस्थितियों का भी सामना करना पड़ा।

किवदंती है कि दुर्ग से युद्ध के दौरान इतना रक्त बहा कि यहां से पाड़े उसके साथ बहकर प्रथम प्रवेश द्वार पर पहुंच कर अटक गए। इसलिए पहले प्रवेश द्वार का नाम पाडन पोल पड़ गया। दूसरे प्रवेश द्वार के निकट भैरूजी का स्थान होने से इसे भैरों पोल कहा जाता है। तृतीय द्वार के बाहर दाईं ओर हनुमानजी की प्राचीन मंदिर है। इससे इस द्वार का नाम हनुमान पोल है। इसी प्रकार चतुर्थ प्रवेश द्वार के बाहर भी दाईं ओर गणेशजी का प्राचीन मंदिर है। इससे इस पोल का नाम गणेश पोल है। पंचम प्रवेश द्वार और छठा प्रवेश द्वार निकट होने से पंचम प्रवेश द्वार को जोरला (पास-पास) पोल कहा जाता है। इसका दूसरा अर्थ यह भी है कि इस पोल के यहां चढ़ाई अधिक होने से यहां पहले ऊंट, घोड़ों, हाथियों को जोर लगाना पड़ता था, इसलिए भी इसे जोरला पोल कहा जाता है।


छठे प्रवेश द्वार के अंदर जाने पर दाईं ओर लक्ष्मणजी का प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। यहां कई सालों से ताला लगा हुआ है। लक्ष्मणजी का मंदिर होने से इसे लक्ष्मण पोल कहा जाता है। सातवें प्रवेश द्वार के अंदर दाईं ओर प्राचीन राम जानकी मंदिर स्थित होने से इसे रामपोल कहा जाता है। अंदर बड़ा चौक है, इसे भी रामपोल चौक कहा जाता है। दुर्ग पर इन सात प्रवेश द्वारों के अलावा पाŸव मार्ग पर सूरजपोल दरवाजा भी स्थित है। इस पोल से उतरते ही सूरजपोल गांव है। गांव के नाम एवं सूर्योदय के समय यहां से सूरज देव के दर्शन होने से इसे सूरजपोल दरवाजा कहा जाता है। इसी प्रकार फतह प्रकाश महल के सामने बड़ी पोल है। यह ऊंचाई में बड़ी होने से इसे बड़ी पोल कहा जाता है।

हर पोल पर रहते थे द्वारपाल व पहरेदार
चित्तौड़ दुर्ग पर प्रमुख रूप से सात दरवाजे हैं, जो रियासत काल में सुरक्षा की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण थे। ये दरवाजे आज भी निर्माण मजबूती की मिसाल बने हुए है। दुर्ग पर रहने वाले लोग बताते है कि इन दरवाजों पर उस समय द्वारपाल और पहरेदार चौबीसों घंटे तैनात रहते थे। रात्रि को दरवाजों के ऊपर तेल के बड़े दीप जलाकर रोशनी की जाती थी। प्रथम द्वार पर नंगाड़े और बड़े घंटे थे। इन्हें बजाकर दरवाजे खोले और बंद किए जाते थे। रियासतकाल में दुर्ग के नीचे जंगल के सिवाय कुछ नहीं था।