
चित्तौड़गढ़. मध्यप्रदेश के राजगढ़ जिले के गेहूंखेड़ी निवासी प्रेमनारायण महाराज को भगवान की भक्ति का रंग ऐसा चढ़ा की सरकारी शिक्षक की नौकरी छोड़ कृष्ण भक्ति में रम गए। अब वे कथा के माध्यम से लोगों को जागरूक कर रहे हैं। खास बात यह है कि प्रेमनारायण महाराज कथा करने के लिए किसी से कोई दान दक्षिणा भी नहीं लेते हैं। कथा में आई भेंट भी गोशाला में देते हैं, जिससे गायों की सेवा हो सके। प्रेमनारायण महाराज को आडंबर पंसद नहीं है। कथा में भीड़ जुटाने या प्रचार प्रसार करने के खिलाफ है। कथा के लिए वे न तो पेम्पलेट, पोस्टर या अन्य प्रचार सामग्री का उपयोग करते हैं। वे जब भी कथा करते है, तो कथा से पहले होने वाले प्रचार-प्रसार में न तो अपना नाम का उल्लेख करने देते है, न ही होर्डिंग- बैनर-पोस्टर में फोटो लगवाते हैं। भक्तों को जब प्रवचन का स्थान व समय का पता लगता है तो हजारों की तादात में भक्त इनके प्रवचन सुनने चले आते है। वाणी में ऐसा तेज है कि भक्त उनकी कथा में चुंबक की तरह खिंचे चले आते हैं।
प्रेमनारायण महाराज की कथा आगाज रविवार को कलश शोभायात्रा के साथ हुई। कथा 4 मई तक राम मोहल्ला मंदिर परिसर में प्रतिदिन दोपहर 12 से तीन बजे तक होगी। रविवार को शोभायात्रा लक्ष्मीनाथ मंदिर शुरू हुई जो विभिन्न मार्गों से होते हुए राम मोहल्ला मंदिर पहुंच संपन्न हुई।यहां मंडप प्रवेश के साथ कथा का शुभारंभ हुआ। पहले दिन महाराज ने भागवत के महत्व पर प्रकाश डाला।
गेहूंखेड़ी में क्षत्रिय परिवार में जन्मे प्रेमनारायण पहले शासकीय शिक्षक थे। एक बार पचोर की कथा में पहुंचे तो कृष्ण की भक्ति में रम गए। इसके बाद शिक्षक की जॉब से इस्तीफा देकर प्रवचन करने लग गए। उन्होंने कुछ नियम ऐसे बनाए जो इस क्षेत्र में अपवाद ही है। उन्होंने तय किया कि वे बैनर-पोस्टर में अपना नाम फोटो नहीं छपवाएंगे। कभी भी कथा करने के लिए कोई दक्षिणा नहीं लेंगे। उनके द्वारा बनाए सिद्धांतों पर वे अड़े रहे, उसका ही परिणाम है कि आज उनकी वाणी के लाखों अनुयायी है। जब कथा करने जाते है तो घर से आटा-दाल व अन्य सामान ले जाते है। प्रेमनारायण सादगी के लिए जाने जाते है। वह समाचार पत्रों में नाम छपवाना भी पसंद नहीं करते हैं। कथा के दौरान फोटो खींचना भी मना रहता है। यहां तक उनके कोई पैर छुए यह भी उन्हें पसंद नहीं। मालवी व स्थानीय बोली में छोटे-छोटे उदाहरणों के माध्यम से गीता का सार सुनाते है।
प्रेमनारायण महाराज का गोमाता से भी उतना ही लगाव है, जितना की कथा से। वह जहां भी कथा करते हैं वहां प्रयास करते हैं एक गोशाला वहां निर्मित हो जाए। ऐसे ही प्रयासों से अभी तक 26 गोशालाओं का निर्माण भी करवाया जा चुका है, जिनका संचालन सुचारू रूप से चल रहा है। सात गोशाला मध्यप्रदेश के विभिन्न जिलों में बनी हुई हैं, वहीं 19 गोशाला राजस्थान के झालावाड़, कोटा, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़ और बारां जिले में चल रही है। वैसे तो वह कथा करने के नाम पर कोई राशि लेते नहीं है, लेकिन जो दानपेटियां व आरती में जो राशि आती है। वह सब स्थानीय गोशाला के विकास में ही लगा देते है। इसमें ग्रामीणों का भी भरपुर सहयोग मिलता है।
Updated on:
30 Apr 2024 03:13 pm
Published on:
30 Apr 2024 02:19 pm
बड़ी खबरें
View Allचित्तौड़गढ़
राजस्थान न्यूज़
ट्रेंडिंग
