राजस्थान की कुछ जातियों में प्रचलित नाता प्रथा के अनुसार विवाहित महिला अपने पति को छोड़ कर किसी अन्य पुरुष के साथ रह सकती है। वहीं पुरुष भी किसी विवाहित महिला को उसकी सहमति से लाकर पत्नी के रूप में रख सकता है। इसे नाता विवाह करना कहते हैं। इसमें कोई औपचारिक रीति रिवाज नहीं करना पड़ता। केवल महिला-पुरुष व उनसे जुड़े पक्षों के बीच आपसी सहमति ही बनानी होती है। इसमें ये सकारात्मक पक्ष है कि विधवा औरतें भी नाता विवाह कर सकती हैं। नाता प्रथा में विवाहित पुरुष विवाहित महिला से जुड़े पक्ष को एक निश्चित राशि अदा कर अपने साथ रख सकता है।
नाते के बदले लेते हैं मोटी रकम
जैसे-जैसे वक्त गुजरता गया अन्य प्रथाओं की तरह इस प्रथा में भी कई परिवर्तन होते चले गए। नाता प्रथा का प्रयोग अब औरतों की दलाली के रूप में भी हो रहा है। आर्थिक रूप से संपन्न जातियों में तो नाता लाने के बदले विवाहित पुरुष महिला के पहले पति को दो से चार लाख रुपए या इससे भी ज्यादा राशि अदा करता है। बताया गया कि इसमें कोई पुरुष विवाहित महिला को उसकी सहमति से पत्नी के रूप में ले आता है। इसका पता चलने पर महिला का पहला पति समाज की पंचायत को इकट्ठा करता है। पंचायत के जरिये पत्नी को ले जाने वाले पुरुष से निश्चित राशि की मांग की जाती है। सौदा तय होने पर पत्नी दूसरे व्यक्ति के पास रहती है। इस दौरान लेन-देन की जाने वाली राशि 'झगड़ा राशिÓ व संबंध विच्छेद 'झगड़ा छूटना' कहलाता है।
महिला को मिलते हैं गहने
सहमति से दूसरे व्यक्ति से नाता विवाह करने वाली महिलाओं को इसके बदले सोने-चांदी के गहने मिलते हैं। अधिकांश बार ऐसा होता है कि नाता करने से पहले महिलाएं पुरुष के समक्ष सोने-चांदी के गहनों की मांग करती है। पहले वाले पति से संबंध-विच्छेद होने पर महिला को गहने लौटाने भी पड़ते हैं। नाता प्रथा में इस लेन-देन के चलते कुछ पुरुष महिलाओं को दलालों के हाथों बेच रहे हैं। इसके अलावा कई पुरुष इस प्रथा की आड़़ में महिलाओं की अदला-बदली भी कर रहे हैं।
आधिकारिक नियंत्रण नहीं
इस प्रथा से हो रहे सामाजिक नुकसान को रोकने के लिए वर्तमान में पंचायतों के पास कोई भी आधिकारिक नियंत्रण नहीं है। नाता प्रथा में दोनों पक्षों में सहमति बनने से कानून भी इसके आगे बेबस हो जाता है। नाता विवाह करवाने यानि झगड़ा छुड़वाने के लिए पंचायतें बैठती हैं। किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी को लाने वाले पुरुष को जाति-पंचायत बैठने के दौरान लगने वाला खर्चा उठाना पड़ता है। दूसरी ओर, नाता प्रथा में समाज के पंचों द्वारा लेन-देन पर सहमति बनाने में भूमिका निभाने के साथ ही पहले विवाह के दौरान जन्मे बच्चों या फिर अन्य मुद्दों पर चर्चा कर निपटारा किया जाता है।
महिला का व्यापार उचित नहीं
हैरत होती है कि आजादी के छह दशकों बाद भी नाता प्रथा जैसी पुरातन परंपरा को बढ़ावा मिल रहा है। इसके कारण कई बार महिला को व्यापार की वस्तु समझ लिया जाता है। एक पति से दूसरे पति तक नाते भेजने के लिए निर्धारित राशि वसूली जाती है। जरुरत है कि ऐसी जागरुकता लाई जाए, जिससे कुप्रथा पर रोक लगे और महिला का सम्मान, गरिमा बरकरार रहे।सुशीला लढ्ढा, अध्यक्ष बाल कल्याण समिति, चित्तौडग़ढ़