
1962 के भारत-चीन युद्ध में शहीद हुए मेजर शैतान सिंह की दुर्लभ जानकारियों के साथ तैयार हुआ वार मेमोरियल
चित्तौडग़ढ़ बड़ीसादड़ी. केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के लेह में बसे गांव चुशूल के आगे रेजांगला मेमोरियल का जीर्णोद्वार किया जाकर पुन: गुरुवार को आम देश वासियों के देखने के लिए इसे लोकार्पित किया गया।
इस स्थान पर 1962 के भारत - चीन युद्ध में बहादुरी से लड़े सैनिकों का संपूर्ण विवरण दर्शाया गया है। वीरता पूर्वक देश पर शहीद हुए 114 जवानों के बारे में यहां पर जानकारियां प्रदर्शित की गई है। 13 कुमाऊं रेजिमेंट की चार्ली कंपनी के कुल 120 जवानों में से इस युद्ध में 114 जवान शहीद हो गए थे। लेकिन युद्ध के दौरान करीब एक हजार से अधिक चीनी सैनिकों को बहादुरी से मार गिराया था। देश के शहीदों की याद में 8 अगस्त 1963 को वार मेमोरियल की स्थापना की गई थी। केंद्र सरकार ने हाल ही में उस वार मेमोरियल का जीर्णोद्वार करवा कर पुन: देश वासियों को लोकार्पित किया। इस युद्ध में शहीद हुए राजस्थान के जोधपुर जिले के निवासी शहीद मेजर शैतान सिंह के बारे में सेना के पास कोई खास जानकारियां नहीं होने से बड़ीसादड़ी निवासी शोधार्थी जय सामोता द्वारा मेजर शैतान सिंह पर लिखी गई जीवनी पर आधारित जानकारियां भारत-चीन बॉर्डर के निकट स्थित रेजांगला वार मेमोरियल के पुनर्निर्माण के दौरान मेजर सिंह के स्तंभ पर प्रदर्शित की गई। बड़ीसादड़ी निवासी जय सामोता को भी भारत सरकार ने मेमोरियल के उद्घाटन समारोह में आमंत्रित किया।
समारोह में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, सीडीएस जनरल बिपिन रावत, 1962 के भारत-चीन युद्ध में बहादुरी से लड़े 13 कुमाऊं रेजिमेंट के तत्कालीन कंपनी कमांडर 89 वर्षीय ब्रिगेडियर आर वी जटार, मेजर शैतान सिंह भाटी के पुत्र नरपत सिंह भाटी सम्मिलित हुए। जय सामोता लंबे समय से मेजर शैतान सिंह की जीवनी पर शोध एवं लेखन कार्य कर रहे हैं। जय ने इस मेमोरियल के लिए मेजर शैतान सिंह के संक्षिप्त जीवन परिचय एवं उनके द्वारा संगृहित मेजर शैतान सिंह के दुर्लभ छायाचित्र भारत सरकार को प्रदान किए जो अपने शोध के दौरान मेजर के परिजनों, मित्रों तथा उनके विद्यालय से प्राप्त किए थे।
शहीद मेजर शैतान सिंह का जीवन परिचय
मेजर शैतान सिंह परमवीर चक्र का जन्म लेफ्टिनेंट कर्नल बहादुर हेम सिंह ओबीआई और जवाहर कंवर के यहां हुआ था। उनके पिता लेफ्टिनेंट कर्नल बहादुर् हेम सिंह जोधपुर स्टेट फोर्सेज में सोवर ओआर के रुप में भर्ती हुए थे। उन्होंने 1914 में प्रथम विश्व युद्ध में हिस्सा लिया और युद्ध के दौरान घायल हो गए थे। बाद में वे जब भारत वापस आए और उसके कुछ समय पश्चात कमीशन अधिकारी बनाए गए। भारत में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 7 जून 1935 को बहादुर की उपाधि के साथ ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश इंडिया क्लास से सम्मानित किया। वह 1935 में सक्रिय सेवाओं से सेवानिवृत्त हुए और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्हें राज्य संपर्क कार्यालय अधिकारी चुना गया। 23 जनवरी 1948 को लेफ्टिनेंट कर्नल हेम सिंह को जोधपुर दरबार द्वारा हाथी सरोपाओ, ताजीम और स्वर्ण से सम्मानित किया। एक मई 1951 को उनका निधन हो गया। मेजर शैतान सिंह ने अपनी प्राथमिक स्कूली शिक्षा सुमेर स्कूल और माध्यमिक स्कूली शिक्षा राजपूत स्कूल चोपासनी से की। उन्होंने 1947 में अपना सैन्य करियर शुरू किया। वह दुर्गा हॉर्स जोधपुर बॉडीगार्ड में स्टेट ऑफिसर कैडेट के रुप में शामिल हो गए। स्वतंत्रता के बाद उनका चयन ओटीएस पूना के लिए हुआ था। 1 अप्रेल 1951 को उन्हें 6 कुमाऊं में स्थानांतरित कर दिया। उन्हें 25 नवंबर 1951 को लेफ्टिनेंट के पद पर पदोन्नत किया गया था। 1953 में शैतान सिंह को कुमाऊं रेजिमेंटल सेंटर में स्थानांतरित कर दिया। जहां उन्होंने प्रशिक्षण कंपनी कमांडर और एडजुटेंट के रूप में कार्य किया और 1955 में उनका प्रमोशन कैप्टन के पद पर हुआ। उन्होंने 13 कुमाऊं की चार्ली कंपनी की कमान संभाली और 18 नवंबर 1962 को रेजांगला की लड़ाई लड़ी। मेजर शैतान सिंह का पार्थिव शरीर फरवरी 1963 के दूसरे सप्ताह में रेजांगला में मिला था। उनके पार्थिव शरीर को विशेष विमान में जोधपुर लाया था और 18 फरवरी 1963 को जोधपुर में पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया था।
Published on:
21 Nov 2021 11:12 pm
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