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किसने कहा कि परमात्मा के प्रेम से ही मिल सकती है तृप्ति

चित्तौडग़ढ़. निम्बाहेड़ा. दिवाकर भवन में चातुर्मास के लिए विराजित साध्वी डॉ सुशील मसा ने गुरुवार को धर्मसभा में कहा कि जिसने परमात्मा से प्रेम किया है, उसने ही प्रेम को जाना पहचाना है। उन्होंने कहा कि वर्तमान युग में प्रत्येक व्यक्ति अहंकार से भरा हुआ है और अहंकार प्रेम का दुश्मन है।

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किसने कहा कि परमात्मा के प्रेम से ही मिल सकती है तृप्ति

चित्तौडग़ढ़. निम्बाहेड़ा. दिवाकर भवन में चातुर्मास के लिए विराजित साध्वी डॉ सुशील मसा ने गुरुवार को धर्मसभा में कहा कि जिसने परमात्मा से प्रेम किया है, उसने ही प्रेम को जाना पहचाना है। उन्होंने कहा कि वर्तमान युग में प्रत्येक व्यक्ति अहंकार से भरा हुआ है और अहंकार प्रेम का दुश्मन है। जहां अहंकार होता है वहां प्रेम की उत्पत्ति नहीं हो सकती। साध्वी डॉ. सुशील ने कहा कि प्रेम को पाने के लिए इस अहंकार को जलने दो। तभी प्रेम उत्पन्न होगा। उत्पन्न प्रेम उतना ही अनंत होगा जैसे आकाश होता है, उतना ही विराट होगा जितने परमात्मा है। परमात्मा के प्रेम से ही तृप्ति मिल सकती है। इससे पूर्व साध्वी श्रद्धा ने आत्म जागरिया का पाठ किया व गीतिका प्रस्तुत की। संघ के पूर्व अध्यक्ष डॉ जेएम जैन ने प्रभावना वितरित की गई। संचालन संघ के मंत्री विजय लोढा ने किया। जावरा, चित्तौडग़ढ़, अजमेर, उदयपुर आदि संघ के सदस्य उपस्थित थे।
भक्ति में नहीं होना चाहिए बनावटीपन
चित्तौडग़ढ़. शान्त-क्रांति संघ की शशिकान्ताजी ने गुरूवार को अरिहन्त भवन में आयोजित धर्मसभा में कहा कि भक्ति में बनावटीपन नहीं होना चाहिये। बगुला भक्ति यानि बाहर एवं अन्दर में बनावटीपन से भक्ति आत्मकल्याण में सहायक नहीं होती। तीन प्रकार की भक्ति होती है। सात्विक भक्ति, राजसी भक्ति एवं तामसी भक्ति। परोपकार एवं आत्मकल्याण के उद्देश्य से की गई भक्ति ही सात्विक भक्ति होती है। स्वार्थवश यानि व्यापार अच्छा चले, धन-वैभव बढ़े, इस उद्देश्य से की गई भक्ति राजसी भक्ति कहलाती है। इस प्रकार फल प्राप्ति के उद्देश्य से की गई भक्ति सार्थक नहीं होती। तीसरी प्रकार की तामसी भक्ति दूसरों को कष्ट पहुंचाने, उन्हें नीचा दिखाने के लिए की जाती है। जो कुमार्ग पर भटका देती है।
इससे पूर्व रचनाश्रीजी ने अप्रत्याख्यानी माया पर विवेचन करते हुए कहा कि मायावी व्यक्ति दूसरों को जाल में फंसाने के लिए जाल बिछाता है और उसमें स्वयं उलझकर तड़पते हुए दम तोड़ देता है। जैसे मकड़ी अपने बनाए हुए जाल में ही फंसकर मर जाती है। द्रव्य माया एवं भाव माया के स्वरूप को समझें और उसको तजने का प्रयास करें। मायावी व्यक्ति के हृदय में धर्म प्रवेश ही नहीं कर सकता। इसलिये धर्मसाधना में लगने से पहले माया को तजना आवश्यक है।


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