
महिलाएं किसी से कम नहीं, वो तो करती दो घरों का नाम रोशन
चित्तौडग़ढ़. हमारी बेटियां और महिलाएं किसी से कम नहीं है। हर क्षेत्र में वो सफलता के नए मुकाम पा रही है। जरूरत है बस उनका हौंसला बढ़ाने की और आगे बढऩे के अवसर देने की। बेटे तो एक कुल का नाम रोशन करते है लेकिन महिलाएं तो दो घरों का नाम रोशन करती है। चाहे शादी हो जाए फिर भी उनकी पहचान सास-ससुर से अधिक माता-पिता के नाम से होती है ऐसे में बेटियों को पराया मानने की मानसिकता त्यागनी होगी। ये विचार विश्व महिला दिवस की पूर्व संध्या पर चित्तौडग़ढ़ जिला कलक्टर का दायित्व निर्वहन कर रही भारतीय प्रशासनिक सेवा की अधिकारी शिवांगी स्वर्णकार की पत्रिका से विशेष बातचीत में सामने आए। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश।
स. आज भी महिलाएं घर की देहरी से बाहर नहीं आ पाती। आईएएस बनने की कैसे सोची।
- मेरे माता-पिता ने शुरू से यही सोचा था कि बेटियों को कुछ बनाना है। उनकी सोच उससे अलग थी जिसमें महिला को केवल गृहिणी की भूमिका तक सीमित माना जाता है। हम भाई-बहन को पढऩे के लिए समान सुविधाएं व अवसर दिए गए।
स. एक बेटी व महिला के नाते समाज में अब तक आपके क्या अनुभव रहे है।
- मेरा मानना है कि अभिभावक अगर बेटियों को मौका दे तो दुनिया में कोई ऐसा काम नहीं जो एक बच्ची या महिला द्वारा नहीं किया जा सकता है। अब भी उन्हें कई बार मौके कम ही मिलते है। मल्टीटॉस्किग एक कला है जो कहते कई लोगों में होती है। महिलाओं को भगवान ने बनाया ही इस तरह कि मल्टीटॉस्किंग में हर महिला जन्म से सक्षम होती है।
स. स्कूल पढ़ाई से लेकर कलक्टर तक आपने कभी किसी स्तर पर भेदभाव होता है।
- मैने अपनसाथ ऐसा कोई भेदभाव नहीं देखा। हमारे घर में हमेशा बराबरी का व्यवहार हुआ जो हर परिवार में होना चाहिए। जिस सर्विस से मैं जुड़ी हुई हूं उसमें भी ऐसा कोई भेद नहीं देखा। मुझे गर्व है कि मैं ऐसी सर्विस का हिस्सा हूं जहां महिला-पुरूष में हर स्तर पर समानता है।
स. समाज में महिलाओं की स्थिति से क्या आप संतुष्ट है।
- अब भी कई बार महिलाओं को ज्यादा पढऩे नहीं दिया जाता है। बेटी १८ साल की होते ही मां बांप की टेंशन बढ़ जाती है कि शादी कर दी जाए और वो गृहिणी हो जाए। ये सही बात नहीं है। कई अन्तरराष्ट्रीय अध्ध्ययन में ये पाया गया कि महिलाओं का दिमाग पुरूषों से ज्यादा तेज चलता है। किसी काम को दक्षता से पूर्ण करने में भी महिलाओं का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर है।
स. महिलाओं के साथ किसी स्तर पर भेदभाव महसूस होता है।
- समाज में स्थिति पहले से बदली है। कई गरीब परिवार भी अब समझने लगे है कि हमे अपनी बेटियों को भी आगे बढ़ाना है। अब भी विशेषरूप से मां-बाप की मानसिकता व सोच बदलने की जरूरत है। हर प्रशासक व सरकार का फोकस रहता है कि इस पर अच्छा कार्य किया जाए।
स. महिलाओं के लिए आने वाले समय में क्या चुनौती मानते है।
- हमारे समाज में बदलाव आ रहा है। लोग इस बात को समझने लगे है कि बच्चियों को आगे बढ़ाना है उनको सुविधाएं देनी है। अब चुनौती यही मल्टीटॉस्किंग वाली है। महिला हाउसवाइफ के साथ वर्किंग वूमेन के रूप में बाहर का काम भी करती है। दोनों काम उसे संभालने पड़ते है। ये बड़ा चलेंज है। इसमें हर महिला को फैमिली सपोर्ट की जरूरत है। जिन महिलाओं को सपने पूरे नहीं करने दिया जाता उनके लिए चैलेंज है कि किस तरह वो इस समाज में अपनी जगह बनााए। किस तरह वो काबिल और आत्मनिर्भर बने और अपनी जिंदगी के सभी निर्णय स्वयं लेने की क्षमता विकसित करे।
स. सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव से महिलाओं के सामने क्या चुनौती है।
- महिलाओं के लिए ही नहीं पूरे समाज के लिए कर्ई चुनौतियां खड़ी हुई है। सोशल मीडिया पर कई बार फेक न्यूज का भी समाज पर नकारात्मक असर होता है। इससे निपटने के लिए सामूहिक प्रयास करने होंगे। पर हां, लड़कियों को, महिलाओं को सोशल मीडिया पर एक्सट्रा केयरफूल रहने की जरूरत है। किसी भी फोरम में अपनी पिक्चर सर्कुेलेट करना ठीक नहीं है। सोशल मीडिया पर कई तरह से सूचनाओं का मिसयूज भी होता है।
स. लिंगानुपात में सुधार के लिए क्या करना होगा।
- पूरे देश में बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान चल रहा है। लिंगानुपात बढ़ाने के लिए हमे इसके लिए मूल जड़स्तर पर काम करने की जरूरत है। भ्रूण हत्या रोकने के लिए सख्ती से काम करने के साथ जागरूकता बढ़ानी होगी। लोगों को प्रेरित करना है कि किस तरह बच्चियां नाम रोशन कर रही उसे बोझ की तरह नहीं ले।
स. प्रशासन व राजनीति में महिलाएं कम क्यों है।
- एक बड़ा कारण हमारे समाज में बेटो को पढ़ाने व बेटियों की शादी करने की जो मानसिकता है। पिछले कुछ वर्षो से सकारात्मक बदलाव है। महिलाओं में जो रोल मॉडल है उनको समाज में प्रोजेक्ट करे ताकि माता-पिता सोचे की बेटी को अफसर, डॉक्टर, इंजीनियर,सीए आदि बना उसके हर सपने को पूरा करना है।
स. आपने प्रशासनिक सेवा में क्या आना पसंद किया।
- ये मेरे माता-पिता की इच्छा था कि मैं शुरू से टॉपर रही तो बेस्ट सर्विस में जाना है। आईएएस ही बेस्ट सर्विस है । बचपन से ठान रखा था कि मुझे आईएएस बनना है और माता-पिता व देश का नाम रोशन करना है। बचपन से ही मम्मी-पापा ने ये भावना मन में डाली कि आपको देश की सेवा करनी है जो गरीब वर्ग है उसके लिए काम करना है। समाज व देश के लिए जितना अमूल्य योगदान इस सर्विस से हो सकता वो अन्य किसी से नहीं। इसीलिए मैने आईएएस बनने का लक्ष्य रखा और उसे हासिल भी किया।
स. महिला दिवस पर क्या संदेश देना चाहेंगे।
- जिस घर में बेटी पैदा होती वहां माता-पिता को सोचना चाहिए कि मैं उस बेटी को हर वो सुविधा दूं जो एक बेटे को दी जाती है। ये भ्रांति दूर करे कि बेटी ससुराल चली जाती ह्रै तो पराई हो जाती है। बेटी कूुछ बनती है तो नाम उसके माता पिता का ही रोशन होता है। हर आदमी ये प्रण लेगा कि मुझे बेटे-बेटी में कोई भेदभाव नहीं करना है तो देश का कायकाल्प संभव है। शिक्षा से आत्मनिर्भर बन हर बेटी/महिला अपने हिसाब से अपनी जिंदगी जी सकती है। इसलिए लड़कियों को पढ़ाई पर खूब ध्यान देना चाहिए।
स. आज आप जिस मुकाम पर है उसमें किनकी भूमिका अहम है
- माता-पिता रामगोपाल स्वर्णकार व सुजाता स्वर्णकार का योगदान सबसे अहम है जिन्होंने हमेशा मुझे व मेरी बहन देवांगी स्वर्णकार (आईआरएस) को ये हौंसला दिया कि तुममे एवं छोटे भाई रोहित में कोई अंतर नहीं है। तुम वो सब कुछ कर सकती हो जो कोई बेटा कर सकता है। शादी के बाद पति कुलदीपकुमार सिंह (आईआरएस) ने भी हमेशा हर कदम पर साथ दिया।
Published on:
07 Mar 2019 11:48 pm
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