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थैलासर : जिस गांव ने दी ‘बॉर्डर’ को कहानी, वहीं दरगाह पर सजती है कौमी एकता की मिसाल

गांव की पहचान केवल वीरता तक सीमित नहीं है। यहां स्थित मामा अब्दुलशाह और भांजा शौकतशाह की दरगाह क्षेत्र की आस्था का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि दोनों पीर ख्वाजा गरीब नवाज के रिश्तेदार थे।

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mama-bhanja ki dargah

जमील अहमद खान

चूरू. जब भी 1971 के भारत-पाक युद्ध और फिल्म ‘बॉर्डर’ का जिक्र होता है, तो शौर्य, बलिदान और लोंगेवाला की वीरगाथा आंखों के सामने तैरने लगती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस ऐतिहासिक कहानी से जुड़ा एक गांव चूरू जिले में भी है। जिला मुख्यालय से करीब 9 किलोमीटर दूर स्थित थैलासर न केवल वीरों की धरती रहा है, बल्कि यहां सदियों से सांप्रदायिक सौहार्द और आस्था की अनूठी मिसाल भी कायम है।

गांव के इतिहास में जहां रणबांकुरों की वीरता दर्ज है, वहीं यहां स्थित मामा-भांजा की दरगाह (Mama Bhanja Ki Dargah) हर धर्म और हर कौम के लोगों को एक सूत्र में बांधती है। ग्रामीणों का कहना है कि यहां आने वाला हर व्यक्ति अपनी श्रद्धा के साथ सजदा करता है और मन्नतें मांगता है।

‘लॉरेंस ऑफ थार’ की उपाधि से किया सम्मानित
इतिहासकारों के अनुसार थैलासर कभी सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण गांव रहा। जागीरी काल में इसकी सुरक्षा के लिए छह बुर्जों वाला गढ़ (Six-bastioned citadel) बनाया गया था। गांव के वीर सपूतों ने कई युद्धों में अपनी बहादुरी का परिचय दिया। इन्हीं में से एक थे कर्नल जयसिंह (Colonel Jai Singh), जिन्होंने 1971 के भारत-पाक युद्ध (1971 India Pakistan War) में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। रेगिस्तान में ऊंट पर करीब एक लाख किलोमीटर की यात्रा कर दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने और रणनीतिक सूचनाएं जुटाने के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें ‘लॉरेंस ऑफ थार’ की उपाधि से सम्मानित किया था।

तीन हिस्सों में बसा हुआ था गांव
कर्नल जयसिंह की पुस्तक ‘बैटल ऑफ लोंगेवाला’ (Battle OF Laungewala) पर आधारित होकर वर्ष 1997 में चर्चित फिल्म ‘बॉर्डर’ (Film Boder) बनी, जिसने देशभर में वीरता की उस गाथा को अमर कर दिया। यही वजह है कि थैलासर (Village Thailasar) का नाम आज भी उस ऐतिहासिक अध्याय से जुड़ा हुआ माना जाता है। इतिहास के जानकार बताते हैं कि करीब 350 वर्ष पहले यह गांव तीन हिस्सों में बसा हुआ था। गांव का नाम भी अपने इतिहास को समेटे हुए है। स्थानीय मान्यता के अनुसार उजड़े हुए स्थान को ‘थेह’ कहा जाता है और यहां से ऊंटों के बड़े-बड़े लश्कर गुजरते थे। इसी कारण ‘थेह’ और ‘लश्कर’ शब्दों के मेल से कालांतर में नाम थैलासर प्रचलित हो गया।

आस्था का केंद्र
गांव की पहचान केवल वीरता तक सीमित नहीं है। यहां स्थित मामा अब्दुलशाह और भांजा शौकतशाह की दरगाह क्षेत्र की आस्था का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि दोनों पीर ख्वाजा गरीब नवाज के रिश्तेदार थे। दरगाह पर हिन्दू, मुस्लिम सहित सभी समुदायों के लोग श्रद्धा से मत्था टेकते हैं। किसान नई फसल या खेत में हल चलाने से पहले यहां बाजरे की घूघरी और चावल की सीरनी चढ़ाकर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। हर वर्ष अक्टूबर माह में लगने वाला उर्स भी क्षेत्रीय एकता और भाईचारे का बड़ा आयोजन बन जाता है। एक ओर जहां थैलासर की मिट्टी ‘बॉर्डर’ जैसी वीरगाथा से जुड़ी है, वहीं दूसरी ओर मामा-भांजा की दरगाह यहां की गंगा-जमुनी संस्कृति को आज भी जीवंत बनाए हुए है।