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स्त्री व हड्डी रोग विशेषज्ञ सहित पांच पद रिक्त

तहसील का सबसे बड़़ा सरकारी अस्पताल खामियों का शिकार हो गया है। नेता सुधारने का दावा करते रहे लेकिन आज तक अस्पताल बीमार की श्रेणी से बाहर नहीं निकल पाया।

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स्त्री व हड्डी रोग विशेषज्ञ सहित पांच पद रिक्त

सरदारशहर. तहसील का सबसे बड़़ा सरकारी अस्पताल खामियों का शिकार हो गया है। नेता सुधारने का दावा करते रहे लेकिन आज तक अस्पताल बीमार की श्रेणी से बाहर नहीं निकल पाया। ६५ बेड वाले राजकीय चिकित्सालय में चिकित्सकों के खाली पद, धूल फांकते महंगे उपकरण, ऑपरेटरों का अभाव, दवा की कमी, साफ-सफाई नहीं होना जैसी अनेक बीमारियों ने जकड़ रखा है। अस्पताल में चिकित्सकों से लेकर वार्ड ब्वाय तक के खाली पदों की लम्बी फेहरिस्त है। लम्बे इंतजार के बावजूद पद खाली पड़े होने से अस्तपाल में न केवल मरीजों का कोई धणी-धोरी नहीं बल्कि कई उपकरण का संचालन भी नहीं हो रहा है।

ये पद चल रहे हंै रिक्त
कहने को तो सेठ छोटूलाल सेठिया राजकीय चिकित्सालय तहसील का सबसे बड़ा चिकित्सालय है मगर मरीजों को यहां पर केवल प्राथमिक उपचार ही मिलता है। अस्पताल में सोनोग्राफी जैसी महत्वपूर्ण सुविधाएं मरीजों को नसीब नहीं हो रही। राजकीय अस्पताल में चिकित्सकों के 12 पद स्वीकृत हैं। वर्तमान में सात चिकित्सक ही कार्यरत हैं। इसमें स्त्री रोग व हड्डी रोग विशेषज्ञ के भी पद खाली पड़े है, जिसके कारण महिलाओं को प्रसव के लिए बाहर जाना पड़ता है।

एमएलसी रिपोर्ट के लिए जाना पड़ता है अन्यत्र
अस्पताल में एक्स-रे मशीन है लेकिन टेक्नीशियन एमआरएस के माध्यम से लगा रखा है। जिसके कारण एमएलसी रिपोर्ट के लिए बाहर जाना पड़ता है। मेगा हाइवे बनने के बाद बढ़े रहे सड़क हादसे हनुमानगढ़-किशनगढ़ मेगा हाइवे बनने के बाद क्षेत्र में सड़क हादसे बढ़े हैं। चिकित्सालय में हड्डी रोग विशेषज्ञ नहीं होने के कारण घायलों को प्राथमिक उपचार कर बीकानेर रैफर करने के अलावा कुछ चारा नहीं है। रैफर किए जाने वाली घायलों में कई घायल रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। इन समस्याओं के चलते चिकित्सालय के बेड खाली पड़े रहते हैं।

असुविधाओं से जूझ रही सीएचसी
क्षेत्र के लोग लम्बे समय से चिकित्सालय को 100 बेड का करने व ट्रोमा सेन्टर शुरू करने की मांग करते आ रहे हैं। तत्कालीन चिकित्सा मंत्री राजेन्द्र राठौड़ ने यहां आयोजित कार्यक्रम दो बार राजकीय अस्पताल को क्रमोन्नत करने का आश्वासन दिया था। फिर भी हॉस्पिटल में कोई सुधार नहीं हुआ। यदि ट्रोमा सेन्टर शुरू होता है तो दुर्घटना के शिकार लोगों को बचाया जा सकता है। चिकित्सकों व चिकित्साकर्मियों के लिए बने सभी आवास जर्जर हो चुके हैं। वर्षों से इन आवासों की मरम्मत नहीं होने के कारण कर्मचारियों को विभिन्न समस्याओं से गुजरना पड़ता है। कार्मिकों को दीवार पर अखबार लगाकर जीवन व्यतीत करना पड़ रहा है। अब नए आवास बनाए जा रहे हैं जो कब तक बनकर तैयार होंगे।