
चूरू. थळी अंचल में गांवों की हवेलियों में बने भित्ति चित्र।,चूरू. थळी अंचल में गांवों की हवेलियों में बने भित्ति चित्र।
एक हवेली की चित्रकारी में लगते थे 2 से 7 वर्ष
धार्मिक चित्रों की शैली में श्रीलंका की चित्रकला का प्रभाव
विजय कुमार शर्मा
चूरू. थळी अंचल में गांवों की हवेलियों में बने भित्ति चित्र देश में अपनी एक अलग ही पहचान रखते हैं। उस जमाने में चित्रकारी दीवारों को सजाने के लिए की जाती थी, जो आज भी मुंह बोलती है। यह मुगल दरबार से निकल राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्र में विकसित हुई थी। गांवों के बुजुर्ग बताते हैं कि क्षेत्र में ये कला मुगल शासक अकबर के देहांत के बाद पनपी। इस मामले को लेकर रतननगर के रिटार्यड प्राचार्य डा. पीडी डांवर ने बताया कि पहले कारीगर दिल्ली व आगरा आदि क्षेत्रों में बनीं इमारतों में काम करते थे व 15 वीं शताब्दी के बाद वहां से प्रदेश में आए। आखिरी मुगल शासक बहादुर शाह जफर की मौत के बाद रतननगर, चूरू, थैलासर, रामगढ़, मेहनसर व बिसाऊ में १८६१ से लेकर १९वीं शताब्दी तक बनीं हवेलियों में कारीगरों ने रंगों से इन्हें सजाया। उन्होंने बताया कि भित्ति चित्रों के विषयों में रामायण, भगवान विष्णु के दशावतार, लोक कथाएं, राग रागिनियां, प्रकृति, वन्य जीवन व राजशाही सहित दैनिक जीवन के ²श्यों को दर्शाए गए हैं। इस्ट इंडिया कंपनी आने के बाद चित्रों में फिरंगियों की जीवन शैली सहित रेलगाड़ी, हवाईजहाज, साइकिल, मोटर गाड़ी व पानी के जहाज सहित उस समय हुए विकास को भी दिखाया गया है। वहीं धार्मिक चित्रों की शैली में श्रीलंका की चित्रकला का प्रभाव भी रहा है।
मुराल व फ्रेस्को तकनीक से बनते थे चित्र
गांव थैलासर मूल के बीकानेर में इएनटी के प्रोफेसर डा. अजीत सिंह बताते हैं कि उस जमाने में गांवों में बनी हवेलियों में चित्रकारी दो विधि से की जाती थी। जिसमें एक मुराल व दूसरी फे्रस्को होती थी। फ्रेस्को दरअसल इटेलियन पद्धति है, जिसमें भवन निर्माण के समय दीवारों पर प्लास्टर चढाने के साथ ही भित्ति चित्र बनाए जाते थे। इसमें सबसे खास बात ये होती थी कि जहां सूरज की रोशनी पड़ती थी, वहीं फ्रेस्को विधि के चित्र बनाए जाते थे। वहीं मुराल विधि के चित्र हवेलियों के भीतर बनें निर्माण की दीवारें सूखने पर लकड़ी के फ्रेम बनाकर स्टेनशील काटा जाता था, फिर चित्रों का लेआउट महीन बिंदुओं के तौर पर उकेरते थे। बाद में चितेरे इन्हें फाइनल टच देकर रंगों से सजाते थे। मंझे हुए कारीगर भवनों के भीतर चित्र उकेरते थे, फ्रेशर्स बाहरी दीवारों पर बड़े चित्र बनाते थे। उन्होंंने बताया कि एक हवेली की चित्रकारी में २ से ७ वर्ष तक लगते थे।
वाष्पीकरण विधि से बनाते थे प्राकृतिक रंग
रतनगनर के बुजुर्गों ने बताया कि इस कला के शुरूआती दौर मेंं केवल प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया जाता था। जिसमें लाल व केसरिया रंग रोहिड़े के फूलों से, काले रंग के लिए नारियल के कचरे को जलाते थे, चूने से सफेद, गेरू (लाल पत्थर) लाल के लिए, नील (इंडिगो) नीले के लिए, केसर नारंगी के लिए और पेवरी (पीली मिट्टी) व तुरईके फूलों से पीला रंग व गोल्डन ब्राउन के लिए गोमूत्र का इस्तेमाल किय जाता था। रंगों को वाष्पीकरण की विधि से तैयार किया जाता था। रंग फीके ना पड़े इसके लिए ऊंट की हडिड्यों का अर्क, आक के पौधे का दूध, लसेड़ेे का गोंद व बैरजा मिलाया जाता था। बाद में १९२० के आसपास जर्मनी से रंग आने लगे थे।
पर्यटन बढ़े तो बढ़ें रोजगार के अवसर
भट्टी क्षेत्र पर शोध कर रहे डा. केसी सोनी ने बताया कि धोरों की सुनहरी मिट्टी में बसे इन गांवों का स्वर्णिम अतीत सरकारी उदासीनता के चलते पर्यटन के तौर पर परवान नहीं चढ़ पाया। अगर पर्यटन के बढावा मिले लोगों को रोजगार के अवसर मिलेंगे। उन्होंने बताया कि इस मामले में जिला बहुत पिछड़ा है, यहां प्रकृति का भरपूर खजाना भरा पड़ा है। गांवों में बने गढ खंडहर हो रहे हैं, मगर पर्यटक यहां से कुछ किमी की दूरी पर स्थित मंडावा, फतेहपुर व लक्ष्मणगढ से ही वापिस लौट जाते हैं। यातायात व अच्छे होटलों की सुविधा नहीं होने के चलते विदेशी सैलानियों में यहां आने का कम ही रूझान रहता है।
Published on:
20 Feb 2023 01:03 pm
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