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कैर-सांगरी ने बनाई विशिष्ट पहचान

पूरे देश व दुनिया में शेखावाटी अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। पहनावे की बात हो या सांस्कृतिक विरासत की बात। खान-पान की, शेखावाटी सब में सिरमौर है।

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कैर-सांगरी ने बनाई विशिष्ट पहचान

कैर-सांगरी ने बनाई विशिष्ट पहचान

कैलाश शर्मा
सुजानगढ़. पूरे देश व दुनिया में शेखावाटी अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। पहनावे की बात हो या सांस्कृतिक विरासत की बात। खान-पान की, शेखावाटी सब में सिरमौर है। गर्मी की शुरुआत होते ही सुजानगढ़, जसवन्तगढ़, लाडनूं, छापर, राजलदेसर, बीदासर, सालासर सहित शेखावाटी की धरती पर झाडिय़ां फूलो से लाल हो जाती है ओर पूरे तीन महिने फलों का आनन्द देती है। इसी तरह राज्य वृक्ष के रूप में जानी जाने वाली खेजड़ी सांगरी के फलों से लदकद रहती है। लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण इनके तीन चौथाई फूल, फलो में तब्दील होने से पहले ही गिर जाते है। जिससे इनकी पैदावार घटकर एक चौथाई हो गई है। ग्रामीण क्षेत्र में कैर सांगरी आय का अच्छा स्त्रोत है, कई गरीब परिवारो के बच्चे ग्रीष्मकालीन अवकाश में कैर सांगरी एकत्रित कर अगले वर्ष की पढ़ाई के लिए पुस्तको के पैसे जुटाते है। कैर का वैज्ञानिक नाम केपरिस डेसिडुवा है, वहीं खेजड़ी का वैज्ञानिक नाम प्रोसोपीस कीनेरार्या है। दोनो फल राजस्थानी थाली की लजीज डिश में शामिल है। शेखावाटी से निकलकर यह फल बाजार में आए ओर राजस्थानी प्रवासियों ने इन्हें देश-दुनिया भर में पहचान दिलाई। कैर-सांगरी राजस्थान का पारम्परिक व्यंजन है। इसका अचार व सब्जियां प्रसिद्ध है। शेखावाटी का प्रसिद्ध पंचकूटा जिसमें कैर-सांगरी, कुमटी, बबूल फली, गूंदा या कमलगट्टा व अमचूर शामिल है, औषधीय गुणो से भी भरपूर है। सेपोनिन कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित करता है तथा कैंसर की बीमारी में एंटी बाइटिक का काम करता है। सांगरी फंगल, दर्द निवारक व कफ के इलाज में कारगर है। सांगरी पोटेशियम, मैग्नीशियम, कैल्शियम, आयरन, ङ्क्षजक, प्रोटीन ओर फाईबर से भरपूर है। महाभारत में कैर का वर्णन पिलु ओर शमी के साथ किया गया है। पिछले दशक से लगातार बढ़ रहा जलवायु परिवर्तन, शेखावाटी मेवो के लिए विष का काम कर रहा है। जलवायु परिवर्तन होने के पीछे मुख्य कारण प्राकृतिक नहीं बल्कि मानवीय है। प्राकृतिक कारण धीरे-धीरे परिवर्तन करते है, लेकिन मानव द्वारा जंगलो की अंधाधुंध कटाई, कारखानो की स्थापना, प्रकृति का अतिदोहन व जैव विविधता को नष्ट करना तीव्र गति से जलवायु परिवर्तन के जिम्मेदार है। खेजड़ी बहुुआयामी खासियत लिए हुए है। बुजुर्ग ग्रामीण बताते है कि 1899-1900 ईस्वी में पड़े दुर्भिक्ष छप्पनियां अकाल में खेजड़ी जीवन रक्षक के रूप में काम आई थी। अगर खेजड़ी नहीं होती तो शायद हमारा अस्तित्व ही न होता। लोगो ने खेजड़ी के पत्तों व छाल को पीसकर उसकी रोटी खाकर गुजारा किया था। जानवरो ने खेजड़ी के पत्तो का सहारा लिया था।

अच्छे स्वास्थ्य के साथ लम्बी उम्र तक जीया जा सकता है
कैंसर, डाईबिटीज, ह्दय रोग, पेट सम्बन्धी बीमारियों, फंगस, दर्द निवारक सहित कई बीमारियो में कैर-सांगरी कारगर साबित हुई है। इसके निरन्तर सेवन से अच्छे स्वास्थ्य के साथ लम्बी उम्र तक जीया जा सकता है।
वैध घेवरचन्द गुर्जर, अध्यक्ष तहसील वैध सभा, सुजानगढ़

दो दशक पहले के लोग जैविक घरेलू सब्जियां जैसे कैर-सांगरी, ग्वारफली, गोटका, कोकला, खेलरी, बड़ी, राबोड़ी का उपयोग करते थे इसलिए उनकी रोग प्रतिरोधक शक्ति अधिक थी। वर्तमान में हरी सब्जियों के रूप में हरा जहर खा रहे है क्योंकि सब्जी की फसल को तैयार होकर बाजार में आने तक करीब पांच बार रासायनिक दवाईयों के छिड़काव से होकर गुजरना पड़ता है।
पीथाराम ज्याणी, अध्यक्ष मांडेता पर्यावरण समिति, सुजानगढ़

कैर के फल में पोषक तत्व भरपूर होते है, लेकिन अंकुरण क्षमता की कमी होती है। किसानो को नर्सरी के पौध तैयार कर उन्हे प्रत्यारोपित करना चाहिए। जिससे उत्पादन बढ़ाया जा सके। सुजानगढ़ के भींमसर, चरला, सारोठिया, उंटालड़, बोबासर सहित तीन दर्जन गांवो के ताल-तलैया क्षेत्र में कैर व सम्पूर्ण क्षेत्र में खेजड़ी के प्रचूर मात्रा में पेड़-पौधे है इस कारण इनकी अच्छी पैदावार के संकेत है।
मोनिका सोनी, गृहणी सुजानगढ