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मरुधरा का स्वाद फीका: मौसम की मार से खेजड़ी सूनी, सांगरी का पड़ा टोटा

थाली में कैर-सांगरी का विशेष स्थान होता है और बड़े होटलों से लेकर विदेशी पर्यटकों तक इसकी स्वादिष्ट सब्जी बेहद पसंद की जाती है लेकिन इस बार बिगड़े मौसम और असमय बारिश, सूखे की स्थिति से इसका उत्पादन प्रभावित हुआ है।

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चूरू. सादुलपुर. मरुस्थलयीय जिले के पंच गौरव में एक जिला एक उत्पाद में शामिल खेजड़ी पर इस बार मौसम की एसी मार पड़ी की अंचल में सांगरी का टोटा हो गया। बसंत में फ्लावर के साथ मिंजर से लकदक हुई जांटी को देख एक आशा बनी थी कि सांगरी अच्छी लगेगी लेकिन बढ़ते घटते तापक्रम के बीच बैशाख में बिजली कड़कना, बूंदाबंदी के साथ तेज हवाएं चलने से फूल से फल बनने से पहले ही लय बिगड़ गई और फल की जगह गळेण्डिये बन गए और अंचल हाथ मलता रह गया।

किसान हुए निराश
खेतों में जो बिना छंगी हुई जांटीखेतीहरों ने सांगरी के लिए छोड़ी थी उनमें फूल आने के बाद भी सांगरी नहीं बन पाने पर किसानों को निराशा हाथ लगी। खेतों या फिर किसी ओट या गाहे बगाहे खड़ीखेजड़ी में कुछेक के सांगरी फल लगा भी लेकिन अभी बुध पूर्णिमा पर फिर बने बरसाती मौसम ने रही सही कसर पूरी कर दी। खेत खेजड़ी तोरई अभियान के संयोजक रामेश्वर प्रजापति ने बताया कि अक्षय तृतीय से अच्छी गर्मी पड़ने पर खेजड़ी की मिंजर फल सांगरी में परिवर्तित हो जाया करती है। बरसाती मौसम, बिजली कड़कने और तेज हवाए चलने से खजेड़ी की तासीर बदल जाती है जिससे फूल सांगरी के रूप में विकसित नहीं हो पाते और उसकी जगह गळेण्डिया बन जाते हैँ। इस बार मौसम कुछ इस तरह का रहा कि खेजड़ी पर सांगरी नहीं लगी।

मरुस्थल का मेवा कैर सांगरी
न केवल सादुलपुर (Sadulpur) बल्कि संपूर्ण जिले में खेजड़ी (Khejri) के सांगरी (Sangri) और कैर (Kair) के लगने वाले कैरियाें पर संकट छा गया। मौसम में परिवर्तन कहें या फिर ग्लोबल वार्मिंग का असर कि खेजड़ी पर लगने वाली सांगरी विकसित नहीं हुई । कैर सांगरी केवल सब्जी की दृष्टि से ही नहीं बल्कि यह मरुधरा की रामबाण औषधि भी है।

मरुस्थल (Desert) का मेवा मनाने जानेवाले “कैर-सांगरी” (Kair-Sangri) की सब्जी प्रीति भोज आयोजन इसके बिना होता ही नहीं है। यह केवल राजस्थान ही नहीं बल्कि देश विदेश में इसकी बड़ी मांग रहती है। मरुस्थलीय संस्कृति और ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही खेजड़ी राजस्थान की तुलसी मानी जाती है तो कैर सदाबार बोझा है जिसके लगने वाले फल कैर औषधीय गुणों का ऐसा फल है जो सब्जी, अचार से लेकर दवा के रूप में हर जीव के लिए उपयोगी है।

उत्पादन हुआ प्रभावित
थाली में कैर-सांगरी (Kair Sangri) का विशेष स्थान होता है और बड़े होटलों से लेकर विदेशी पर्यटकों तक इसकी स्वादिष्ट सब्जी बेहद पसंद की जाती है लेकिन इस बार बिगड़े मौसम और असमय बारिश, सूखे की स्थिति से इसका उत्पादन प्रभावित हुआ है। विशेषज्ञों के अनुसार पहले जहां रेगिस्तान में प्राकृतिक रूप से कैर और सांगरी प्रचुर मात्रा में मिल जाया करते थे, वहीं अब इनकी पैदावार लगातार घटती जा रही है। बदलते मौसम का कैर के पौधों और खेजड़ी वृक्षों पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। खेजड़ी के सांगरी नहीं लगने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ा है।

रामसिंह कांधल, गौरी शंकर वशिष्ठ का कहना है कि मौसम संतुलित होने पर प्राकृतिक वनस्पतियां आसानी से पनप जाया करती थी। अब अप्रैल-मई में तापमान में निरंतर आ रहे बदलाव का असर सीधे मरु जिले की जैव विविधता पर पड़ रहा है। पर्यावरणविद्नेतराम मेहरा ,सुमेरसिह सिहाग, सूबेदार मेवासिह सहारण, जगतसिंह तथा रामसिंह काजल ने बताया कि पर्यावरण संरक्षण, पौधरोपण और प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में काम करना आवश्यक है। जल संरक्षण को बढ़ावा देना वर्तमान की आवश्यकता है।